Kerala Election 2026: केरल विधानसभा चुनाव में अब महज कुछ ही दिनों का समय बचा है। ऐसे में एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने राज्य की पूरी राजनीति में भूचाल ला दिया है। हर कोई यही सोच रहा है कि क्या एक झटके में बाजी पलट गई है? एक तरफ जहां सत्ताधारी पार्टी अपनी कुर्सी बचाने के लिए पसीना बहा रही है, तो वहीं दूसरी तरफ विपक्ष वापसी के लिए जोर लगा रहा है। (Kerala Election 2026) लेकिन इन सबके बीच एक पार्टी ऐसी है जो दक्षिण भारत के इस अहम राज्य में अपना झंडा गाड़ने का सपना देख रही थी। उन्होंने इसके लिए सालों तक एक खास रणनीति पर काम किया। लोगों का दिल जीतने की हर मुमकिन कोशिश की गई। लेकिन अब चुनाव के ठीक पहले एक ऐसा कदम उठा लिया गया है जिसे राजनीतिक गलियारों में एक बड़ा सेल्फ गोल कहा जा रहा है।
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Kerala Election 2026: अठारह प्रतिशत का वो बड़ा सियासी तिलिस्म
राजनीति के जानकारों की मानें तो केरल में सत्ता की चाबी एक खास वोट बैंक के पास है। राज्य में लगभग अठारह प्रतिशत ईसाई मतदाता हैं। ये मतदाता किसी एक इलाके में नहीं बल्कि पूरे राज्य में फैले हुए हैं। जो भी पार्टी इनका भरोसा जीत लेती है, उसका सत्ता तक पहुंचना काफी आसान हो जाता है। पिछले कुछ सालों से भारतीय जनता पार्टी ने इस समुदाय के करीब जाने के लिए एक शानदार रणनीति बनाई थी। (Kerala Election 2026) इसका असर साल दो हजार चौबीस के लोकसभा चुनावों में साफ देखने को मिला था। तब रबर के किसानों से किए गए वादों के कारण ईसाई समुदाय का एक बड़ा हिस्सा उनके साथ खड़ा नजर आया था। उस दौरान पार्टी का वोट प्रतिशत तेजी से बढ़ा और उन्हें एक सीट पर ऐतिहासिक जीत भी मिली। इसी सफलता को दोहराने के लिए पार्टी ने इस बार भी कई बड़े ईसाई चेहरों को चुनावी मैदान में उतारा है। लेकिन अब कहानी में एक नया और बड़ा ट्विस्ट आ गया है।
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नए कानून ने अचानक बढ़ा दी राजनीतिक सरगर्मी
चुनाव के इस बेहद नाजुक मोड़ पर सरकार ने लोकसभा में एफसीआरए संशोधन विधेयक दो हजार छब्बीस पेश कर दिया। सरकार का कहना है कि यह बिल देश में काम कर रहे गैर सरकारी संगठनों को मिलने वाले विदेशी चंदे में पारदर्शिता लाने के लिए बहुत जरूरी है। लेकिन इस एक बिल ने केरल के पूरे चुनावी समीकरण को बुरी तरह से उलझा कर रख दिया है। विपक्षी दलों ने तुरंत इस बड़े मुद्दे को लपक लिया है और इसे सीधे तौर पर अल्पसंख्यकों और ईसाइयों के खिलाफ बताना शुरू कर दिया है। कांग्रेस के बड़े नेता भी खुलकर इसके विरोध में उतर आए हैं और इसे एनजीओ को परेशान करने वाला कानून बता रहे हैं।
क्या बदल जाएगा पूरा समीकरण?
उनका आरोप है कि जो संस्थाएं समाज के लिए अच्छा काम कर रही हैं, उन्हें इस नए नियम के जरिए बेवजह निशाना बनाया जाएगा। अब कई ईसाई धर्मगुरु भी इस नए बिल का मुखर होकर विरोध कर रहे हैं।