Rajya Sabha: भारतीय राजनीति में एक ऐसा पल आया है जिसने न सिर्फ संसद बल्कि समाज की सोच को भी नई दिशा दे दी है। एक नाम, एक पहचान और एक साहस इन तीनों ने मिलकर इतिहास रच दिया। सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी (Menaka Guruswamy) अब राज्यसभा की सदस्य बन चुकी हैं, और इसके साथ ही वह LGBTQ+ समुदाय से आने वाली पहली सांसद बन गई हैं। यह सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि समानता और अधिकारों की एक बड़ी कहानी है।
Rajya Sabha: निर्विरोध जीत और नई पहचान
राज्यसभा की 37 सीटों में से 26 पर उम्मीदवारों का निर्विरोध चुना जाना पहले ही चर्चा में था, लेकिन इनमें मेनका गुरुस्वामी का नाम सबसे ज्यादा खास बन गया। (Rajya Sabha) तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया और यह फैसला अब एक ऐतिहासिक कदम के रूप में देखा जा रहा है। सोमवार और मंगलवार को बाकी सीटों पर चुनाव भी पूरे हुए, लेकिन गुरुस्वामी की जीत ने अलग ही पहचान बनाई।
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कानून की दुनिया से संसद तक
51 वर्षीय मेनका गुरुस्वामी सिर्फ एक वकील नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की मजबूत आवाज रही हैं। उन्होंने University of Oxford, Harvard Law School और National Law School of India University जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से शिक्षा हासिल की है। उनके काम में हमेशा संविधान, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की झलक दिखाई देती है।
मेनका गुरुस्वामी और उनकी साथी Arundhati Katju उस ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई का हिस्सा थीं, जिसने 2018 में सुप्रीम कोर्ट को 158 साल पुराने कानून को खत्म करने के लिए प्रेरित किया। (Rajya Sabha) इस फैसले ने समलैंगिक रिश्तों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया और LGBTQ+ समुदाय को नई पहचान और सम्मान दिया।
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संसद में नई आवाज
गुरुस्वामी का कहना है कि संविधान के ‘समानता, भाईचारा और भेदभाव रहित व्यवहार’ जैसे मूल्य ही उनके काम की नींव रहे हैं। (Rajya Sabha) अब वह राज्यसभा में पश्चिम बंगाल का प्रतिनिधित्व करते हुए इन्हीं आदर्शों को आगे बढ़ाना चाहती हैं।
टीएमसी की रणनीति और बड़ा संदेश
तृणमूल कांग्रेस ने इस बार कई बड़े नामों को राज्यसभा भेजा है, जिनमें Babul Supriyo, Rajeev Kumar और Koel Mallick शामिल हैं। पार्टी के अंदर इसे एक बड़ी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जहां शिक्षित और संवैधानिक समझ रखने वाले चेहरों को आगे लाया जा रहा है।