लखनऊ की सियासत इन दिनों असामान्य हलचल से गुजर रही है। वजह विपक्ष के हमले या सरकार के नए फैसले नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की लगातार हो रही अहम राजनीतिक मुलाकातें हैं। बीती रात उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से करीब 35 मिनट तक बातचीत की। इसके बाद सुबह उन्होंने दोनों उपमुख्यमंत्रियों केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक से अलग-अलग लगभग 15-15 मिनट की मुलाकात की। इन बैठकों के बाद राजनीतिक गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म है।
हालांकि इन मुलाकातों का आधिकारिक एजेंडा सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन इसे महज शिष्टाचार भेंट मानने को तैयार कम ही लोग हैं। 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भाजपा और संघ दोनों के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में पार्टी का प्रदर्शन उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि संगठन और सरकार दोनों आगामी चुनाव को लेकर सतर्क रणनीति बनाना चाहते हों। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संघ प्रमुख ने प्रदेश नेतृत्व से अलग-अलग फीडबैक लिया है ताकि जमीनी हकीकत का आकलन किया जा सके
कुछ मुद्दों ने सरकार को किया असहज
हाल के महीनों में कुछ मुद्दों ने सरकार को असहज किया है। यूजीसी नियमों में बदलाव को लेकर उठे सवाल, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़ा विवाद और वाराणसी के मणिकर्णिका घाट ध्वस्तीकरण पर विपक्ष के हमले इन सबने राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया है। खासकर समाजवादी पार्टी इन मुद्दों को लेकर सरकार पर लगातार दबाव बनाए हुए है। ऐसे में संघ यह समझना चाहता है कि कार्यकर्ताओं और परंपरागत समर्थकों के बीच किस तरह की प्रतिक्रिया है और किसी भी संभावित नाराजगी को कैसे दूर किया जाए।
डैमेज कंट्रोल’ की कवायद
इन मुलाकातों को ‘डैमेज कंट्रोल’ की कवायद के रूप में भी देखा जा रहा है। हाल में विपक्ष ने ब्राह्मण समुदाय की नाराजगी का मुद्दा जोर-शोर से उठाया है। दिलचस्प बात यह है कि संघ प्रमुख से मुलाकात से पहले उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने 101 बटुक ब्राह्मणों का सम्मान किया, जिसे एक प्रतीकात्मक संदेश माना गया। इससे पहले केशव प्रसाद मौर्य भी इस विषय पर अपनी स्थिति स्पष्ट कर चुके हैं।
संघ प्रमुख का एक बयान भी चर्चा में है, जिसमें उन्होंने कहा कि वे भाजपा को ‘रिमोट कंट्रोल’ से नहीं चलाते और हिंदू समाज के एजेंडे पर काम करने वाले सभी दल उनके लिए समान हैं। भले ही यह औपचारिक बयान हो, लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। संघ स्वयं को सांस्कृतिक संगठन बताता है, पर चुनावी रणनीति और जमीनी नेटवर्क में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि बड़े चुनाव से पहले संगठन और सरकार के बीच तालमेल की समीक्षा सामान्य प्रक्रिया है। संभावित मंत्रिमंडल विस्तार और संगठनात्मक बदलाव की चर्चाएं भी तेज हैं। क्या नेतृत्व में कोई परिवर्तन होगा? क्या रणनीति में नया मोड़ आएगा? इन सवालों के स्पष्ट जवाब भले न हों, लेकिन इतना तय है कि 2027 की तैयारी अभी से शुरू हो चुकी है और उत्तर प्रदेश की सियासत में हर कदम सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है