Atal Vajpayee delimitation 2001: भारतीय राजनीति के गलियारों में इन दिनों ‘परिसीमन’ शब्द की गूंज सबसे ज्यादा है। संसद के विशेष सत्र में सरकार लोकसभा की सीटों को बढ़ाकर 850 करने की तैयारी में है, लेकिन इस कदम ने उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है। (Atal Vajpayee delimitation 2001) विपक्ष इसे ‘क्षेत्रीय असंतुलन’ का हथियार बता रहा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज से करीब ढाई दशक पहले भी देश बिल्कुल इसी मोड़ पर खड़ा था? उस वक्त महान राजनेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी जादुई कूटनीति से इस विवाद का ऐसा रास्ता निकाला था कि पूरे देश ने राहत की सांस ली थी।
Atal Vajpayee delimitation 2001: वाजपेयी सरकार का वो ऐतिहासिक ‘फ्रीज’ दांव
साल 2001 में जब देश में नई जनगणना के आंकड़े सामने आए, तब परिसीमन का मुद्दा गरमा गया था। नियम के मुताबिक सीटों की संख्या बढ़नी थी, लेकिन वाजपेयी सरकार के सामने एक बड़ी नैतिक और राजनीतिक दुविधा थी। दक्षिण भारतीय राज्यों ने परिवार नियोजन कार्यक्रम को बहुत बखूबी लागू किया था, जबकि उत्तर भारत में जनसंख्या तेजी से बढ़ रही थी। (Atal Vajpayee delimitation 2001) अगर उस वक्त सीटें बढ़तीं, तो दक्षिण के राज्यों को उनकी ‘अच्छी परफॉर्मेंस’ के लिए सजा मिलती और उनकी लोकसभा सीटें कम हो जातीं। अटल जी ने इस खतरे को भांप लिया और लोकतंत्र की गरिमा बचाते हुए परिसीमन को अगले 25 सालों यानी 2026 तक के लिए ‘फ्रीज’ कर दिया। उन्होंने साफ किया कि विकास की राह पर चलने वालों का नुकसान नहीं होने दिया जाएगा।
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अरुण जेटली का वो तर्क जिसने सबको कर दिया था शांत
21 अगस्त 2001 का वो दिन संसद के इतिहास में दर्ज है, जब तत्कालीन कानून मंत्री अरुण जेटली ने सदन में संविधान संशोधन विधेयक पेश किया था। जेटली ने बहुत ही तार्किक ढंग से समझाया था कि देश की ‘राष्ट्रीय जनसंख्या नीति’ का लक्ष्य 2026 तक आबादी को स्थिर करना है। इसलिए, जब तक जनसंख्या का संतुलन नहीं बनता, तब तक सीटों की संख्या को 1971 की जनगणना के आधार पर ही स्थिर रखना चाहिए। (Atal Vajpayee delimitation 2001) सरकार का प्रस्ताव था कि सीटों की कुल संख्या (543) नहीं बदलेगी, बस निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को अंदरूनी तौर पर एडजस्ट किया जाएगा ताकि मतदाताओं की संख्या में समानता रहे। वाजपेयी सरकार की इस दूरदर्शिता के कारण उस वक्त एक बड़ा संवैधानिक संकट टल गया था।
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क्यों आज का परिसीमन बन गया है ‘फ्लैशपॉइंट’?
आज विवाद की असली वजह वो ‘फासला’ है जो उत्तर और दक्षिण के बीच बढ़ने वाला है। सरकार का प्रस्ताव है कि हर राज्य में लोकसभा की सीटें करीब 50 फीसदी बढ़ाई जाएं। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में सीटें 80 से बढ़कर 120 हो सकती हैं, वहीं तमिलनाडु में 39 से बढ़कर 60। गणित तो सीधा है कि दोनों जगह 50% वृद्धि हुई, लेकिन असली पेंच आंकड़ों के अंतर में है। (Atal Vajpayee delimitation 2001) वर्तमान में यूपी और तमिलनाडु के बीच 40 सीटों का अंतर है, जो परिसीमन के बाद बढ़कर 60 हो सकता है। विपक्षी दलों और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का यही डर है कि इससे संसद में उत्तर भारत का दबदबा इतना बढ़ जाएगा कि दक्षिण की आवाज कमजोर पड़ जाएगी।
महिला आरक्षण और परिसीमन का अनूठा गठबंधन
इस पूरी कहानी का एक और महत्वपूर्ण सिरा ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ से जुड़ा है। (Atal Vajpayee delimitation 2001) साल 2023 में जब महिला आरक्षण बिल पास हुआ, तो उसमें एक बड़ी शर्त रखी गई थी- आरक्षण तभी लागू होगा जब नया परिसीमन पूरा हो जाएगा। (Atal Vajpayee delimitation 2001) सरकार का लक्ष्य इसे 2029 के चुनाव तक जमीन पर उतारना है। अब सरकार 2027 की जनगणना का इंतजार करने के बजाय 2011 के आंकड़ों पर ही परिसीमन करना चाहती है। विपक्ष इसे ‘जल्दबाजी’ और ‘अन्यायपूर्ण’ बता रहा है। उनका कहना है कि अगर सरकार वाकई गंभीर है, तो वर्तमान 543 सीटों पर ही महिलाओं को आरक्षण क्यों नहीं दे देती?
दक्षिण की मांग: 30 साल का और इंतजार
दक्षिण भारत के नेता अब वाजपेयी सरकार के उसी फॉर्मूले की याद दिला रहे हैं। एम.के. स्टालिन की मांग है कि परिसीमन को अगले 30 सालों तक और टाल दिया जाए। (Atal Vajpayee delimitation 2001) उनका तर्क है कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व केवल सिर गिनने (जनसंख्या) का मामला नहीं होना चाहिए, बल्कि उन राज्यों के योगदान का भी सम्मान होना चाहिए जिन्होंने राष्ट्रहित में अपनी आबादी को नियंत्रित किया है। साल 2001 की वो बहस आज फिर प्रासंगिक हो गई है। वाजपेयी जी ने तब संवाद और समझौते से रास्ता निकाला था, अब देखना यह है कि मौजूदा सरकार इस जटिल राजनीतिक बिसात पर अपनी चाल कैसे चलती है।