Europe Gen Z Protests: 1 नवंबर 2026। यूरोप के सबसे समृद्ध और विकसित समझे जाने वाले देशों की सड़कों पर एक नई पीढ़ी अपना असंतोष व्यक्त कर रही है। फ्रांस में स्कूलों और विश्वविद्यालयों की बदहाल व्यवस्था को लेकर शुरू हुआ आंदोलन महंगाई, आवास संकट और सरकार के प्रति व्यापक नाराजगी में बदल गया है। जर्मनी में युवाओं ने शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और अनिवार्य सैन्य सेवा के सवाल पर बड़े प्रदर्शन किए हैं। स्विट्जरलैंड में भी इसका असर दिखाई दिया है। वहां ज्यूरिख और बासेल में 31 अक्टूबर की रात हुई हिंसक घटनाओं ने प्रशासन को सतर्क कर दिया है। एक ओर हजारों युवा शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगें उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ शहरों में दुकानों की लूट, आगजनी, पुलिस पर हमले और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं ने आंदोलन की दिशा और नेतृत्व पर सवाल खड़े किए हैं।
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इन घटनाओं को केवल युवाओं की नाराजगी अथवा कानून-व्यवस्था की समस्या मानना पर्याप्त नहीं होगा। इनके पीछे यूरोपीय समाज में उभर रहा एक व्यापक पीढ़ीगत असंतोष है। युवा महसूस कर रहे हैं कि उन्हें अपने माता-पिता की पीढ़ी की तुलना में अधिक महंगी शिक्षा, अधिक खर्चीला आवास, अनिश्चित रोजगार और कम सुरक्षित आर्थिक भविष्य मिल रहा है। जलवायु परिवर्तन से लेकर सैन्य संघर्षों तक के फैसलों का असर उनके भविष्य पर पड़ेगा, लेकिन राजनीतिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी आवाज सीमित है। हालांकि तीनों देशों में विरोध की प्रकृति, संगठन और राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। फ्रांस में आंदोलन का स्पष्ट छात्र-आधारित इतिहास है। जर्मनी में एक संगठित युवा अभियान ने कई मुद्दों को एक साथ जोड़ा है। स्विट्जरलैंड में अभी उतना बड़ा राष्ट्रीय जनांदोलन दिखाई नहीं दिया है, लेकिन यूरोपीय विरोध की लहर से प्रेरित हिंसक जमावड़ों की पुष्टि हुई है।
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Europe Gen Z Protests: फ्रांस: एक स्कूल से शुरू हुआ आंदोलन पूरे देश की नाराजगी में कैसे बदल गया?
फ्रांस में इस आंदोलन की शुरुआत सितंबर के मध्य में पेरिस के निकट क्रेतेय क्षेत्र के एक स्कूल से हुई। 17 सितंबर को आंत्वान द सेंट-एक्जूपेरी हाई स्कूल के शिक्षकों ने अध्यापकों की कमी के विरोध में हड़ताल की। छात्रों और अभिभावकों ने उनका समर्थन किया तथा स्कूल के प्रवेश द्वार पर अवरोध खड़ा किया। इस घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर फैल गए और दूसरे स्कूलों में भी विरोध शुरू हो गया। शीघ्र ही छात्रों ने खराब इमारतों, अत्यधिक भरी हुई कक्षाओं, शिक्षकों की कमी, पढ़ाई के बोझ और विश्वविद्यालयों में दाखिले की व्यवस्था पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। अक्टूबर तक आंदोलन एक हजार से अधिक हाई स्कूलों को प्रभावित कर चुका था। इस प्रकार एक स्थानीय शैक्षिक समस्या राष्ट्रीय असंतोष की शुरुआत बन गई।
फ्रांस में छात्रों की विशेष नाराजगी विश्वविद्यालयों में प्रवेश देने वाली ‘Parcoursup’ प्रणाली को लेकर है। छात्रों का आरोप है कि प्रवेश के मानदंड पर्याप्त पारदर्शी नहीं हैं और इससे सामाजिक तथा आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विद्यार्थियों को नुकसान होता है। इसके साथ विश्वविद्यालयों में उपलब्ध सीटों, छात्रवृत्ति और शैक्षणिक सुविधाओं को लेकर भी असंतोष है। छात्र संगठनों का तर्क है कि सरकार युवाओं से बेहतर प्रदर्शन की अपेक्षा तो करती है, लेकिन उन्हें इसके लिए आवश्यक संसाधन नहीं देती। इसके बाद आंदोलन में महंगाई, मकान के किराये, मजदूरी और सार्वजनिक सेवाओं के मुद्दे जुड़ते चले गए। इस विस्तार ने स्कूल के छात्रों के साथ विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों, श्रमिकों तथा दूसरे सामाजिक संगठनों को भी जोड़ दिया।
फ्रांस में आंदोलन के पीछे कौन-कौन सी ताकतें हैं?
फ्रांस का आंदोलन किसी एक राजनीतिक दल ने शुरू नहीं किया था। प्रारंभिक पहल छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों की थी। बाद में छात्र संगठनों के साथ देश की प्रभावशाली ट्रेड यूनियनें भी जुड़ने लगीं। इनमें ‘Confédération Générale du Travail’ अर्थात CGT जैसे श्रमिक संगठन शामिल हैं। वर्ष 2018 में ईंधन की कीमतों और आर्थिक असमानता के विरोध से प्रसिद्ध हुआ ‘येलो वेस्ट्स’ आंदोलन भी वर्तमान प्रदर्शनों से जुड़ा है। इससे आंदोलन का सामाजिक आधार व्यापक हुआ है। हालांकि छात्र संगठनों, श्रमिक यूनियनों और येलो वेस्ट्स की मांगें पूरी तरह समान नहीं हैं। कोई शैक्षणिक सुधार चाहता है, कोई वेतन और महंगाई से राहत, तो कोई राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की नीतियों में व्यापक बदलाव की मांग कर रहा है। फ्रांस में 2027 के राष्ट्रपति चुनाव के कारण इन प्रदर्शनों का राजनीतिक महत्व भी बढ़ गया है। अलग-अलग दल इन घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं, लेकिन आंदोलन को किसी एक दल द्वारा संचालित बताने का प्रमाण नहीं मिला है।
प्रदर्शन कितने बड़े हैं और हिंसा कहां हुई?
फ्रांस के तीन प्रमुख सप्ताहांतों में प्रदर्शनकारी — सरकारी अनुमान
17 अक्टूबर
5.50 लाख
24 अक्टूबर
4.10 लाख
31 अक्टूबर
3.20 लाख
ये केवल निर्दिष्ट तीन तिथियों की भागीदारी के आंकड़े हैं, पूरे आंदोलन का संयुक्त योग नहीं। स्रोत: फ्रांसीसी प्रशासन के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट।
फ्रांस में 17 अक्टूबर को कुछ स्थानों पर आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया। दुकानों में तोड़फोड़ हुई, लूटपाट की घटनाएं सामने आईं और पुलिस के साथ टकराव हुआ। 24 अक्टूबर के प्रदर्शन अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहे, हालांकि गिरफ्तारियां और छिटपुट झड़पें जारी रहीं। 31 अक्टूबर को भी अनेक शहरों में लाखों लोग निकले। पेरिस में बड़े पैमाने पर शांतिपूर्ण मार्च हुआ, लेकिन इसके समाप्त होने के आसपास कुछ समूहों की पुलिस से झड़प हुई। देशभर में शनिवार को 560 से अधिक गिरफ्तारियों की जानकारी सामने आई। सरकार ने लगभग 70 हजार पुलिसकर्मी और सुरक्षाकर्मी तैनात किए थे। इन घटनाओं में अंतर करना जरूरी है। बड़ी संख्या में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों और श्रमिकों को उन समूहों के समान नहीं माना जा सकता जिन्होंने आगजनी और लूटपाट की।
मैक्रों सरकार का रुख: बातचीत भी, सख्ती भी
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार ने दो स्तरों पर प्रतिक्रिया दी है। पहले स्तर पर शैक्षणिक सुधारों और रियायतों की घोषणा की गई है। सरकार ने 2027 में विश्वविद्यालय प्रवेश प्रणाली में बदलाव तथा 2028 तक मौजूदा Parcoursup व्यवस्था को बदलने का प्रस्ताव रखा है। लगभग 15 हजार अतिरिक्त उच्च शिक्षा स्थान उपलब्ध कराने, कुछ कक्षाओं में छात्रों की संख्या सीमित करने, 500 अतिरिक्त शिक्षण पदों और स्कूलों तथा विश्वविद्यालयों की मरम्मत के लिए लगभग चार अरब यूरो के ऋण जैसे उपाय भी सामने आए हैं। छात्रवृत्ति को महंगाई से जोड़ने की बात कही गई है। लेकिन छात्र नेताओं का कहना है कि ये उपाय अपर्याप्त हैं। उनकी मांगों में विश्वविद्यालयों की क्षमता कहीं अधिक बढ़ाना भी शामिल है।
दूसरे स्तर पर सरकार ने हिंसक प्रदर्शनों के खिलाफ कठोर सुरक्षा नीति अपनाई है। प्रधानमंत्री सेबास्तियां लेकोर्नू ने छात्रों की वास्तविक शिकायतों के समाधान पर जोर देते हुए हिंसा की निंदा की। गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज ने सार्वजनिक अव्यवस्था के गंभीर खतरे की चेतावनी दी। पेरिस में कुछ केंद्रीय क्षेत्रों में प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाए गए और रात में आवाजाही पर पाबंदियां लगाई गईं। कुछ प्रतिबंधों को अदालतों में चुनौती भी दी गई। पुलिस बल के अत्यधिक इस्तेमाल के आरोपों के बीच सरकार ने अक्टूबर के प्रारंभ में छात्र प्रदर्शनों के दौरान स्टन ग्रेनेड के प्रयोग को अस्थायी रूप से निलंबित करने का निर्णय लिया था। इस प्रकार फ्रांसीसी सरकार के सामने एक ओर शिक्षा व्यवस्था में सुधार करने का दबाव है, दूसरी ओर कानून-व्यवस्था और नागरिकों के प्रदर्शन के अधिकार के बीच संतुलन बनाने की चुनौती।
जर्मनी: युवाओं का सवाल—शिक्षा और रोजगार की जगह हथियारों पर इतना खर्च क्यों?
फ्रांस के बाद सबसे संगठित विरोध जर्मनी में देखने को मिला है। यहां 31 अक्टूबर को ‘Gen Z regelt’ नामक युवा पहल ने बर्लिन, फ्रैंकफर्ट, म्यूनिख, कोलोन, हैम्बर्ग, स्टुटगार्ट सहित 34 शहरों में प्रदर्शन आयोजित किए। इस अभियान का आशय है कि अब नई पीढ़ी स्वयं अपने भविष्य की जिम्मेदारी संभालेगी। प्रदर्शन से पहले आयोजकों ने लगभग एक लाख 60 हजार लोगों की संभावित भागीदारी का दावा किया था, हालांकि वास्तविक संख्या इससे कम रही। बर्लिन के ब्रांडेनबर्ग गेट पर पुलिस ने लगभग पांच हजार लोगों का अनुमान लगाया, जबकि आयोजकों ने लगभग 11 हजार लोगों के आने का दावा किया। स्टुटगार्ट में पुलिस ने करीब छह हजार प्रदर्शनकारी बताए। देशभर में दसियों हजार लोग विरोध में उतरे।
जर्मन आंदोलन की विशेषता यह है कि इसके केंद्र में केवल आर्थिक शिकायतें नहीं हैं। शिक्षा के लिए अधिक बजट, स्कूलों और विश्वविद्यालयों में बेहतर सुविधाएं, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा में निवेश, जलवायु परिवर्तन से निपटने की प्रभावी नीतियां, आम लोगों के लिए किफायती जीवन तथा सैन्य सेवा का विरोध इसकी प्रमुख मांगें हैं। जर्मनी में रक्षा तैयारियों और संभावित अनिवार्य सैन्य सेवा को लेकर जारी बहस ने युवाओं की चिंता बढ़ाई है। आंदोलनकारियों का सवाल है कि जब शिक्षा और सामाजिक सेवाओं के लिए संसाधनों की कमी बताई जाती है, तो रक्षा क्षेत्र पर बड़े खर्च को किस तरह प्राथमिकता दी जा रही है। यह सवाल सरकारी सुरक्षा नीति और युवाओं की सामाजिक-आर्थिक प्राथमिकताओं के बीच मतभेद को सामने लाता है।
कौन चला रहा है जर्मनी का आंदोलन?
जर्मनी में ‘Gen Z regelt’ इस विरोध का प्रमुख आयोजनकर्ता है। इसके सक्रिय युवा चेहरों में 18 वर्षीय अकरम सेलो का नाम सामने आया है। उन्होंने प्रदर्शन से पहले कहा था कि युवाओं को अपने भविष्य की चिंता है और यदि राजनेता कदम नहीं उठाएंगे तो युवाओं को स्वयं सक्रिय होना पड़ेगा। आंदोलन ने सोशल मीडिया के जरिए बड़ी संख्या में लोगों तक अपनी बात पहुंचाई। इसका आधार केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहा; स्कूली छात्रों और दूसरे युवा समूहों ने भी रुचि दिखाई। आयोजकों ने अपने अभियान में हिंसा, नस्लवाद, नफरत फैलाने वाले भाषणों और संविधान-विरोधी प्रतीकों से दूरी रखने की घोषणा की है।
इस आंदोलन के पीछे राजनीतिक समर्थन की स्थिति फ्रांस की तुलना में अधिक स्पष्ट है। जर्मनी की विपक्षी पार्टी ‘द लेफ्ट’ अर्थात Die Linke और ग्रीन पार्टी के युवा संगठनों ने प्रदर्शनों का समर्थन किया है। ‘लेफ्ट यूथ’ ने चांसलर फ्रेडरिक मर्ज और उपचांसलर लार्स क्लिंगबाइल की सरकार की खर्च-कटौती संबंधी नीतियों के विरुद्ध युवाओं की सक्रियता का स्वागत किया। ‘ग्रीन यूथ’ के प्रवक्ता लुइस बोबगा ने भी युवाओं के सड़क पर उतरने को महत्वपूर्ण बताया। दोनों दलों से जुड़े युवा संगठनों ने 20 नवंबर के प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय युवा हड़ताल दिवस में भागीदारी का समर्थन किया है। हालांकि इन राजनीतिक संगठनों का समर्थन मिलना और उनके द्वारा पूरे आंदोलन का संचालन किया जाना दो अलग बातें हैं। उपलब्ध प्रमाण पहले तथ्य की पुष्टि करते हैं, दूसरे की नहीं।
आखिर जर्मनी में हिंसा क्यों भड़की?
जर्मनी में 31 अक्टूबर को अधिकांश प्रदर्शनों का शुरुआती हिस्सा शांतिपूर्ण रहा, लेकिन शाम और रात में कई शहरों में टकराव हुआ। फ्रैंकफर्ट में दुकानों में लूटपाट, पत्थरबाजी और पुलिस पर ज्वलनशील पदार्थ फेंकने की घटनाएं सामने आईं। कोलोन में पुलिस ने कुछ समूहों को हटाने के लिए वाटर कैनन का उपयोग किया। हैम्बर्ग में अवरोधकों में आग लगाई गई। कुछ दूसरे शहरों में भी नकाब पहने समूहों के साथ पुलिस की झड़प हुई। इन घटनाओं में कई पुलिसकर्मियों के घायल होने की सूचना है। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की घटनाओं ने शांतिपूर्ण आयोजकों के सामने भी चुनौती पैदा की है, क्योंकि हिंसक गतिविधियां आंदोलन की मूल मांगों से ध्यान हटा रही हैं।
जर्मनी की मर्ज सरकार का क्या रुख है?
चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की सरकार में शामिल CDU/CSU के कई नेताओं ने प्रदर्शनों को लेकर सख्त चेतावनी दी है। सत्ताधारी गठबंधन के घरेलू मामलों के प्रवक्ता अलेक्जेंडर थ्रोम ने आशंका व्यक्त की कि हिंसक अतिवामपंथी समूह और आपराधिक तत्व युवा आंदोलन का इस्तेमाल कर सकते हैं। जर्मन संसद की खुफिया निगरानी समिति के अध्यक्ष मार्क हेनरिखमान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़े उग्र वामपंथी नेटवर्क की भूमिका पर चिंता जताई। बाडेन-वुर्टेमबर्ग के आंतरिक मामलों के मंत्री मानुएल हागेल ने हिंसक गतिविधियों पर कानून के तहत कड़ी कार्रवाई करने की बात कही है। पुलिस यूनियनों ने भी स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार सुरक्षित रहेगा, लेकिन तोड़फोड़ और हमले स्वीकार नहीं किए जाएंगे।
यहां एक महत्वपूर्ण राजनीतिक विभाजन दिखाई देता है। सरकार का केंद्र-दक्षिणपंथी CDU/CSU नेतृत्व प्रदर्शनों में हिंसक समूहों की संभावित घुसपैठ को लेकर चिंतित है, जबकि विपक्ष के वामपंथी और ग्रीन युवा संगठन आंदोलन को सामाजिक असंतोष की अभिव्यक्ति के रूप में देखते हैं। हालांकि उग्रवादी घुसपैठ की आशंका को सभी प्रदर्शनकारियों के चरित्र का प्रमाण नहीं माना जा सकता। जर्मन समाजशास्त्री सेबास्टियन कूस ने भी आंदोलन की पूर्व निर्धारित, पंजीकृत और शांतिपूर्ण संगठन-पद्धति को फ्रांस की परिस्थितियों से अलग बताया था।
स्विट्जरलैंड: समृद्ध देश में भी क्यों पहुंची विरोध की आग?
स्विट्जरलैंड का मामला फ्रांस और जर्मनी से अलग है। यहां 31 अक्टूबर को किसी विशाल राष्ट्रीय छात्र आंदोलन की पुष्टि नहीं हुई, लेकिन ज्यूरिख और बासेल में यूरोप के दूसरे देशों में चल रहे विरोध से प्रेरित हिंसक जमावड़े सामने आए। देश के प्रमुख शहर ज्यूरिख में सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं को प्रदर्शन के लिए एकत्र होने के संदेश प्रसारित किए गए थे। पुलिस के अनुसार ये आह्वान विशेष रूप से फ्रांस में हाल के विरोध और हिंसा से जुड़े थे। शनिवार रात करीब साढ़े दस बजे कई सौ लोग लैंगस्ट्रासे इलाके में एकत्र हुए। कुछ लोगों ने चेहरे ढक रखे थे, कुछ सुरक्षा चश्मे पहने हुए थे और कई हैलोवीन की वेशभूषा में थे।
इसके बाद लैंगस्ट्रासे और हेल्वेटियाप्लात्स के आसपास कूड़ेदानों और दूसरी वस्तुओं से अवरोध बनाए गए और आग लगा दी गई। कुछ इलेक्ट्रिक साइकिलों तथा स्कूटरों को भी जलाया गया। एक कार को नुकसान पहुंचा और दुकानों तथा सार्वजनिक परिवहन से जुड़ी संपत्ति के शीशे टूटे। पुलिस पर पत्थर, बोतल और आतिशबाजी की सामग्री फेंकी गई। जवाब में पुलिस ने वाटर कैनन, उत्तेजक रसायन और रबर की गोलियों का इस्तेमाल किया। स्थानीय पुलिस के अनुसार एक स्थान पर चिकित्सा सहायता के लिए पहुंची पुलिस की गाड़ी भी भीड़ के हमले का शिकार हुई। रात लगभग डेढ़ बजे स्थिति शांत हुई। पुलिस ने नुकसान का आकलन और घटनाओं की जांच शुरू की है।
बासेल में लगभग 150 लोगों ने बिना अनुमति जुलूस निकाला। यह रात नौ बजे क्लाराप्लात्स से शुरू हुआ और शहर के कई हिस्सों से गुजरते हुए सेंट योहांस-प्लात्स तक पहुंचा। वहां प्रदर्शनकारियों ने सड़क पर अवरोध बनाकर आग लगा दी। सार्वजनिक परिवहन अस्थायी रूप से बाधित करना पड़ा और कुछ संपत्ति को नुकसान पहुंचा। पुलिस के हस्तक्षेप के बाद भीड़ तितर-बितर हुई तथा दमकलकर्मियों ने आग बुझाई।
स्विट्जरलैंड में प्रदर्शन के पीछे कौन है?
स्विस सार्वजनिक प्रसारक SRF के अनुसार ज्यूरिख में हुए जमावड़े का आह्वान उग्र वामपंथी समूहों की ओर से किया गया था। यह जानकारी स्विट्जरलैंड की घटनाओं को समझने में महत्वपूर्ण है। जर्मनी में ‘Gen Z regelt’ जैसा एक नामित अभियान दिखाई देता है, जबकि स्विट्जरलैंड में तत्काल हुई हिंसक घटनाओं का स्वरूप अधिक बिखरा हुआ और स्थानीय रहा। सोशल मीडिया पर फ्रांस के प्रदर्शनों से जुड़ी अपीलें प्रसारित हुई थीं। लेकिन किसी एक राष्ट्रीय संगठन या राजनीतिक दल द्वारा ज्यूरिख और बासेल की सभी हिंसक गतिविधियों की योजना बनाए जाने का स्वतंत्र प्रमाण नहीं है।
स्विट्जरलैंड के युवाओं की व्यापक चिंताएं यूरोप के दूसरे देशों से पूरी तरह अलग नहीं हैं। महंगे आवास, जीवनयापन का खर्च, शिक्षा और रोजगार की संभावनाएं तथा भविष्य को लेकर असुरक्षा यहां भी चर्चा में हैं। लेकिन इन व्यापक समस्याओं को 31 अक्टूबर की हर हिंसक घटना का सिद्ध कारण नहीं कहा जा सकता। स्थानीय स्तर पर कुछ आह्वान पुलिस की कथित कठोर कार्रवाई के विरोध से भी जुड़े थे। इसीलिए स्विट्जरलैंड की घटनाओं को सीधे फ्रांस जैसी व्यापक शिक्षा-सुधार की मांग वाला आंदोलन मानना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
स्विस सरकार और प्रशासन का रुख
ज्यूरिख और बासेल के स्थानीय प्रशासन ने बिना अनुमति हुई हिंसक गतिविधियों पर पुलिस कार्रवाई की। ज्यूरिख प्रशासन ने सार्वजनिक संपत्ति को जलाने तथा पुलिस पर हमलों को गंभीरता से लिया और आपराधिक जांच शुरू की। बासेल पुलिस ने यातायात बाधित होने, आगजनी और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं का विवरण जारी किया। फिलहाल उपलब्ध आधिकारिक सूचनाओं में इन घटनाओं पर संघीय सरकार के किसी व्यापक नए नीतिगत निर्णय की पुष्टि नहीं है। इसलिए स्थानीय पुलिस की कार्रवाई को पूरे स्विस संघीय मंत्रिमंडल का विस्तृत राजनीतिक रुख बताना उचित नहीं होगा।
इस बीच स्विट्जरलैंड के पूर्व संघीय मंत्री और वर्तमान में यूरोप की परिषद के महासचिव एलेन बेरसे ने 29 अक्टूबर को यूरोप के युवा प्रदर्शनों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। उन्होंने युवाओं के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का समर्थन किया, लेकिन हिंसा की स्पष्ट निंदा की। उनके अनुसार इन आंदोलनों से एक पूरी पीढ़ी के भविष्य को लेकर बढ़ती बेचैनी सामने आ रही है। स्विट्जरलैंड के कई शहरों में 20 नवंबर को भी युवा लामबंदी प्रस्तावित है। बेरसे की टिप्पणी को स्विस संघीय सरकार का आधिकारिक वक्तव्य नहीं, बल्कि उनके वर्तमान अंतरराष्ट्रीय पद से व्यक्त दृष्टिकोण के रूप में समझना चाहिए।
पूरे यूरोप में एक साथ युवाओं के विरोध के पीछे क्या कारण हैं?
तीनों देशों की परिस्थितियों को जोड़कर देखने पर आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक असंतोष के कुछ साझा कारण सामने आते हैं। पहला कारण शिक्षा और अवसरों के बीच बढ़ती दूरी है। स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पर्याप्त संसाधन न होने की शिकायतें केवल फ्रांस तक सीमित नहीं हैं। जर्मनी में भी पुराने स्कूल भवनों, शिक्षकों की कमी और सार्वजनिक सेवाओं के बजट को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। दूसरी ओर, युवाओं के सामने रोजगार, महंगे आवास और स्वतंत्र जीवन शुरू करने की चुनौतियां हैं। युवा अपने भविष्य की तुलना पिछली पीढ़ी से कर रहे हैं और कई लोगों को लगता है कि आर्थिक प्रगति का लाभ समान रूप से नहीं बंट रहा। तीसरा कारण राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा है। यूरोप के अनेक युवा मानते हैं कि सरकारें पेंशन, रक्षा, वित्तीय अनुशासन और दूसरे क्षेत्रों में बड़े निर्णय करती हैं, लेकिन उनके दीर्घकालिक असर को लेकर युवाओं से पर्याप्त संवाद नहीं होता।
हथियारों पर खर्च और सामाजिक सेवाओं के बजट का विवाद
जर्मनी में सैन्य सेवा और रक्षा खर्च का प्रश्न सीधे आंदोलन की मांगों में शामिल है। दूसरी ओर फ्रांस में शिक्षा बजट, सरकारी कर्ज और सार्वजनिक सेवाओं पर खर्च की प्राथमिकताओं को लेकर असंतोष है। रूस-यूक्रेन युद्ध और यूरोप की सुरक्षा संबंधी चुनौतियों ने रक्षा तैयारियों को यूरोपीय सरकारों के लिए अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। सरकारें इस खर्च को राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखती हैं, जबकि कुछ युवा संगठन सवाल उठा रहे हैं कि शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और जलवायु संबंधी निवेश की जरूरतों को कैसे पूरा किया जाएगा। यह जरूरी नहीं कि रक्षा खर्च बढ़ने का हर निर्णय सीधे शिक्षा बजट में कटौती का कारण बना हो। लेकिन सार्वजनिक संसाधनों के वितरण पर राजनीतिक मतभेद निश्चित रूप से इन प्रदर्शनों का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
सोशल मीडिया बना आंदोलन फैलाने का माध्यम
एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि यूरोप में विरोध की यह लहर किसी एक अंतरराष्ट्रीय संगठन की घोषित योजना के तहत नहीं चल रही है। अलग-अलग देशों में आंदोलन के स्थानीय कारण और स्थानीय नेतृत्व हैं। लेकिन सोशल मीडिया ने इनके बीच विचारों, प्रतीकों और प्रदर्शन की रणनीतियों का आदान-प्रदान तेज किया है। फ्रांस में स्कूलों की नाकेबंदी के वीडियो प्रसारित हुए। जर्मनी में संगठित ऑनलाइन अभियान के माध्यम से प्रदर्शनकारियों को एकत्र किया गया। स्विट्जरलैंड में भी सोशल मीडिया और संबंधित इंटरनेट मंचों पर प्रसारित अपीलों के बाद जमावड़े हुए। इस तरह राष्ट्रीय सीमाओं के पार विरोध की प्रेरणा पहुंच रही है। फिर भी एक देश के प्रदर्शन से प्रेरणा लेने का अर्थ यह नहीं कि दूसरे देश के आंदोलन का संचालन भी उसी संगठन द्वारा किया जा रहा है।
क्या किसी अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक ताकत का हाथ है?
यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अलग-अलग देशों में कुछ प्रदर्शन हिंसक हुए हैं और उग्र वामपंथी समूहों की संभावित भूमिका पर सुरक्षा एजेंसियों ने चिंता जताई है। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर तीन स्तरों को अलग करना होगा।
पहला स्तर वे छात्र, युवा और श्रमिक संगठन हैं जो अपनी घोषित सामाजिक-आर्थिक मांगों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। दूसरा स्तर राजनीतिक दलों और उनके युवा संगठनों का है, जो इन प्रदर्शनों का समर्थन कर रहे हैं या उनके मुद्दों को राजनीतिक बहस में उठा रहे हैं। तीसरा स्तर उन हिंसक समूहों का है जो कुछ प्रदर्शनों में शामिल हुए हैं या जिनकी संभावित भागीदारी को लेकर पुलिस ने चेतावनी दी है। इन तीनों को एक ही संगठनात्मक शक्ति मानना गलत होगा।
जर्मनी में वामपंथी और ग्रीन युवा संगठनों का समर्थन दर्ज है। फ्रांस में छात्र संगठनों के साथ श्रमिक यूनियनें और येलो वेस्ट्स सक्रिय हैं। स्विट्जरलैंड में कुछ हिंसक जमावड़ों के आह्वान को स्थानीय रिपोर्टों ने उग्र वामपंथी समूहों से जोड़ा है। लेकिन तीनों देशों के आंदोलनों को किसी एक विदेशी सरकार, गुप्त वित्तपोषक या केंद्रीय अंतरराष्ट्रीय संगठन द्वारा संचालित करने का पुष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है। जर्मन नेताओं के अंतरराष्ट्रीय उग्रवादी नेटवर्क संबंधी आरोपों की जांच हो सकती है, लेकिन उन आरोपों को अपने आप सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता।
क्या आंदोलन से सरकारें पीछे हट रही हैं?
फिलहाल तीनों देशों में सरकारी प्रतिक्रियाएं अलग-अलग दिखाई दे रही हैं। फ्रांस में आंदोलन के बाद शिक्षा संबंधी रियायतों और सुधारों की ठोस घोषणाएं हुई हैं। इसके बावजूद प्रदर्शन जारी हैं। जर्मनी में सरकार से जुड़ी प्रतिक्रियाओं का मुख्य जोर कानून-व्यवस्था, हिंसा रोकने और उग्रवादी तत्वों की संभावित घुसपैठ पर रहा है। व्यापक छात्र मांगों पर कोई तुलनीय राष्ट्रीय समझौता सामने नहीं आया है। स्विट्जरलैंड में 31 अक्टूबर की घटनाओं पर मुख्यतः स्थानीय पुलिस और प्रशासन ने कार्रवाई की है।
इस प्रकार अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि युवा आंदोलन अपनी सभी मांगें मनवा चुके हैं। फ्रांस में कुछ मांगों पर घोषणाएं हुई हैं, लेकिन उनका वास्तविक क्रियान्वयन बाकी है। जर्मनी में विरोध ने राष्ट्रीय राजनीतिक बहस को प्रभावित किया है, मगर नीति परिवर्तन का परिणाम अभी स्पष्ट नहीं है। स्विट्जरलैंड में आंदोलन के राष्ट्रीय स्वरूप और भविष्य की दिशा को लेकर स्थिति अभी विकसित हो रही है।
आगे क्या होने वाला है?
यूरोप में विरोध की यह लहर नवंबर में भी जारी रह सकती है। फ्रांस की ट्रेड यूनियनों ने 5 नवंबर को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है। छात्र संगठनों ने स्कूलों और विश्वविद्यालयों में आगे भी विरोध कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणा की है। जर्मनी में वामपंथी और ग्रीन युवा संगठनों ने 20 नवंबर के अंतरराष्ट्रीय युवा हड़ताल दिवस का समर्थन किया है। स्विट्जरलैंड के कई शहरों में भी उसी तारीख को लामबंदी प्रस्तावित है। हालांकि किसी प्रस्तावित कार्यक्रम का अर्थ यह नहीं कि उसमें कितनी भागीदारी होगी या वह किस दिशा में जाएगा, यह पहले से निश्चित है।
यूरोप का असली सवाल: क्या नई पीढ़ी का भविष्य पुरानी पीढ़ी जितना सुरक्षित है?
जर्मनी, फ्रांस और स्विट्जरलैंड के प्रदर्शनों से एक व्यापक सामाजिक प्रश्न उभरता है। विकसित देशों में रहने वाले युवा भी शिक्षा, आवास, रोजगार और जीवनयापन की लागत को लेकर असंतोष व्यक्त कर रहे हैं। वे अपनी सरकारों से अधिक सामाजिक निवेश, अवसरों तक समान पहुंच और निर्णय प्रक्रिया में अपनी भागीदारी चाहते हैं। कई युवाओं को लगता है कि आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्थाएं उनके भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप पर्याप्त तेजी से नहीं बदल रही हैं।
लेकिन इस पूरी कहानी का दूसरा पक्ष भी है। यूरोप की सरकारों को सीमित सार्वजनिक संसाधनों, बढ़ते वित्तीय दायित्वों, रक्षा आवश्यकताओं और सामाजिक सुरक्षा की मांगों के बीच निर्णय लेने पड़ रहे हैं। प्रदर्शनकारी इन प्राथमिकताओं को चुनौती दे रहे हैं। सरकारें कुछ मांगों पर बातचीत कर रही हैं, जबकि हिंसा पर कठोर कार्रवाई का रास्ता अपना रही हैं। इन दोनों के बीच नागरिक स्वतंत्रता, सार्वजनिक सुरक्षा और लोकतांत्रिक जवाबदेही के सवाल भी खड़े हुए हैं।
यह भी याद रखना होगा कि हर युवा प्रदर्शनकारी नहीं है और हर प्रदर्शन हिंसक नहीं है। फ्रांस में लाखों लोगों की भागीदारी के बीच हिंसा कुछ स्थानों पर हुई। जर्मनी में अधिकांश प्रदर्शन दिन के समय शांतिपूर्ण रहे। स्विट्जरलैंड में अभी सीमित स्थानीय घटनाओं की पुष्टि है। इसलिए पूरे यूरोप को एक समान हिंसक जनविद्रोह की स्थिति में बताना उपलब्ध तथ्यों से आगे बढ़ना होगा।
फिलहाल यूरोप में Gen-Z की सक्रियता ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। क्या विकसित समाजों की समृद्धि का अर्थ केवल उनकी वर्तमान आर्थिक स्थिति है, या यह भी कि नई पीढ़ी को शिक्षा, अवसर और सुरक्षित भविष्य का भरोसा मिल सके? फ्रांस, जर्मनी और स्विट्जरलैंड की सड़कों से उठ रही आवाजों के बीच यही प्रश्न सबसे अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देता है।