FIFA World Cup 1998: 1994 का अमेरिकी विश्वकप खत्म हुआ तो फुटबॉल एक नए दौर के दरवाज़े पर खड़ा था। यह अब सिर्फ खेल नहीं रहा बल्कि मनोरंजन उद्योग और विज्ञापन का सबसे बड़ा मंच बन चुका था। अमेरिका में मिली ज़बरदस्त दर्शक संख्या ने फीफा को यकीन दिला दिया था कि फुटबॉल अब सच में दुनिया का खेल बन गया है। पर जितनी लोकप्रियता बढ़ी, मुकाबला भी उतना ही कड़ा होता गया।
FIFA World Cup 1998: जब विश्वकप का दायरा और बड़ा हुआ
1998 का विश्वकप इस बदलते दौर की तस्वीर था। पहली बार 24 नहीं, 32 टीमें खेलीं। फीफा ने एशिया, अफ्रीका और उत्तरी अमेरिका को ज़्यादा जगह दी। यह सिर्फ विस्तार नहीं था बल्कि यह मान लेना था कि फुटबॉल की प्रतिभा अब सिर्फ यूरोप और दक्षिण अमेरिका तक सीमित नहीं रही। इस विस्तार से दक्षिण अफ्रीका, जापान, जमैका और क्रोएशिया जैसे देशों को पहली बार विश्वकप खेलने का मौका मिला।
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ब्लैक-ब्लांक-बेउर: एक टीम जो पूरे देश की पहचान बनी
वर्ल्ड कप की मेज़बानी फ्रांस को मिली थी जो यूरोप की सबसे असरदार ताक़तों में से एक था। पर यह विश्वकप सिर्फ खेल का मामला नहीं था बल्कि यह आधुनिक फ्रांस की सामाजिक पहचान का जश्न भी था। फ्रांसीसी टीम में अफ्रीकी, अरब और यूरोपीय मूल के खिलाड़ी एक साथ थे। इस टीम को प्यार से ‘ब्लैक-ब्लांक-बेउर’ कहा गया, यानी अश्वेत, श्वेत और अरब मूल के लोग। बढ़ते नस्लवाद के बीच यह टीम देश की एकता का सबसे बड़ा चेहरा बन गई।
रोनाल्डो: वह नाम जिससे सब डरते थे
टूर्नामेंट से पहले सबसे बड़ा आकर्षण ब्राज़ील था। 1994 का चैंपियन और भी मज़बूत दिख रहा था और उनके पास था रोनाल्डो, जिसे उस वक्त दुनिया का सबसे बड़ा हुनरमंद खिलाड़ी माना जाता था। उनकी गति, ड्रिब्लिंग और गोल करने की भूख गज़ब की थी। कई जानकार मानते थे कि यह पेले और माराडोना के बाद का अगला बादशाह बन सकता है।
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ज़िदान: शांत दिमाग़ जो मैदान बदल देता था
दूसरी तरफ मेज़बान फ्रांस के पास एक शांत स्वभाव वाला खिलाड़ी था। जो धीरे-धीरे सबका ध्यान खींच रहा था। वो ज़्यादा बोलता नहीं था, विवादों से दूर रहता था, पर गेंद उसके पैरों में आते ही खेल की रफ़्तार बदल जाती थी। नाम था, ज़िनेदिन ज़िदान। वो अल्जीरियाई मूल का लड़का फ्रांस के साधारण इलाकों में पला-बढ़ा। उनकी ताक़त रफ़्तार नहीं बल्कि समझ थी। वे खेल को दूसरों से पहले पढ़ लेते थे।
टूर्नामेंट की चमकती कहानियां
विश्वकप शुरू हुआ और नई कहानियां सामने आने लगीं। नाइजीरिया ने अफ्रीका की तरफ से शानदार खेल दिखाया। अर्जेंटीना-इंग्लैंड मुकाबले में सिर्फ अठारह साल के माइकल ओवेन ने वह गोल किया जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया। इसी के साथ एक नए सितारे का जन्म भी हुआ। इसी मैच में इंग्लैंड के डेविड बेकहम को अर्जेंटीना के सिमीओने को लात मारने पर लाल कार्ड मिला। जिसके बाद उन्हें पूरे इंग्लैंड में गुस्से का सामना करना पड़ा। नॉकआउट दौर में फ्रांस के लॉरेंट ब्लांक ने पैराग्वे के खिलाफ 114वें मिनट में विश्वकप इतिहास का पहला ‘गोल्डन गोल’ दागा।
फ्रांस धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। उसकी मज़बूत रक्षा, संतुलित मध्य क्षेत्र और ज़िदान पूरे अभियान के केंद्र में। सऊदी अरब के खिलाफ एक मैच में विरोधी खिलाड़ी पर पैर रखने के कारण उन्हें लाल कार्ड और दो मैच का बैन मिला पर टीम का भरोसा उन पर बना रहा।
सेमीफाइनल: शूटआउट और एक छोटे देश की चमक
सेमीफाइनल में ब्राज़ील का सामना नीदरलैंड्स से हुआ। ये टूर्नामेंट का सबसे रोमांचक मुकाबला था जो पेनाल्टी शूटआउट तक गया और ब्राज़ील जीता। फ्रांस ने क्रोएशिया को हराकर फाइनल में जगह बनाई। क्रोएशिया का यह पहला विश्वकप था और उन्होंने कमाल का खेल दिखाया। स्ट्राइकर डावोर शुकर ने 6 गोल करके गोल्डन बूट जीता और अपने छोटे से देश को दुनिया के फुटबॉल नक्शे पर तीसरे स्थान तक पहुंचा दिया।
फाइनल से पहले वह रहस्यमयी घटना
12 जुलाई 1998। पेरिस का स्टेड द फ्रांस स्टेडियम। फाइनल मैच, फ्रांस बनाम ब्राज़ील यानी ज़िदान बनाम रोनाल्डो। मैच से कुछ घंटे पहले एक हैरान करने वाली खबर आई कि रोनाल्डो की सेहत बिगड़ गई थी। कहा गया उन्हें दौरा पड़ा है। शुरुआती टीम लिस्ट में उनका नाम नहीं था फिर अचानक वापस आ गया। मीडिया और फैंस सब भ्रम में थे और आज तक यह पूरी तरह साफ नहीं हुआ कि असल में क्या हुआ था।
बताया जाता है कि मैच की दोपहर रोमारियो के कमरे में रोनाल्डो अचानक बेहोश हो गए और उनके मुंह से झाग निकलने लगा। डॉक्टर उन्हें अस्पताल ले गए। पर प्रायोजकों के दबाव और रोनाल्डो की खुद खेलने की ज़िद के आगे कोच ज़ागालो को झुकना पड़ा और उन्हें बिना किसी वार्म-अप के सीधे मैदान पर उतार दिया गया।
फाइनल: दो हेडर जिन्होंने इतिहास बदल दिया
मैच शुरू हुआ तो साफ दिख रहा था कि रोनाल्डो अपने सामान्य रूप में नहीं हैं। फ्रांस पूरी तरह तैयार था। पहले हाफ में ज़िदान ने दो कॉर्नर पर शानदार हेडर से दो गोल कर दिए। स्टेडियम खुशी से झूम उठा। ब्राज़ील स्तब्ध रह गया। जिस खिलाड़ी से गोल की उम्मीद थी वही ज़िदान अब खुद गोल कर रहे थे। अपनी कमज़ोर मानी जाने वाली हेडिंग तकनीक से।
दूसरे हाफ में ब्राज़ील ने वापसी की कोशिश की पर फ्रांस की रक्षा अडिग रही। आख़िरी पलों में इमैनुएल पेटिट ने तीसरा गोल कर दिया। स्कोर रहा 3-0। यह सिर्फ जीत नहीं थी बल्कि एक एलान थी।
पेरिस की वह रात
फ्रांस पहली बार विश्व चैंपियन बना। पेरिस की सड़कों पर लाखों लोग निकल आए। यह जीत सिर्फ खेल की उपलब्धि नहीं थी बल्कि आधुनिक फ्रांस की बहुसांस्कृतिक कामयाबी का प्रतीक भी बन गई। ज़िदान राष्ट्रीय नायक बन गए। अल्जीरियाई मूल का एक लड़का अब फ्रांस की सबसे बड़ी खेल पहचान बन चुका था। आर्क डी ट्रायम्फ पर उनकी तस्वीर के साथ लिखा गया, ‘ज़िजू फॉर प्रेसिडेंट।’ यह जीत फ्रांस के सामाजिक इतिहास का सबसे भावुक पल बन गई।
जो आगे बाकी था
1998 का विश्वकप कई वजहों से ऐतिहासिक है, पहला 32 टीमों वाला विश्वकप, ज़िदान का विश्व मंच पर आना, रोनाल्डो का अनसुलझा रहस्य, और यह साबित होना कि मेज़बान देश भी आधुनिक दौर में जीत सकता है।
पर इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा अभी बाकी था। रोनाल्डो की यह हार आख़िरी नहीं थी। चार साल बाद वे लौटेंगे, पहले से ज़्यादा मज़बूत, पहले से ज़्यादा खतरनाक, ब्राज़ील की नई पीढ़ी के साथ। और एशिया की धरती पर खेला जाने वाला अगला विश्वकप फुटबॉल का भूगोल हमेशा के लिए बदल देगा।