Israel Election Result 2026: इजरायल की राजनीति इस वक्त एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां चुनाव जीतने के बावजूद प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता बचाना मुश्किल होता दिख रहा है। चुनाव में उनकी पार्टी और सहयोगी दल सबसे बड़ा गठबंधन बनकर जरूर उभरे, लेकिन बहुमत से दूर रह गए। दूसरी तरफ पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइसेनकोट के नेतृत्व में विपक्ष सत्ता परिवर्तन की उम्मीद लगाए बैठा है। इस पूरे सियासी खेल में सबसे अहम भूमिका उन 19 सांसदों की हो गई है, जो दो अरब राजनीतिक दलों- राआम (Ra’am) और जॉइंट लिस्ट से आते हैं।
Also Read –Bangladesh Anti India Protest: ‘दिल्ली ना ढाका’ के नारों से गूंजा बांग्लादेश, भारत के खिलाफ किसने खोला मोर्चा?
इजरायल की 120 सदस्यीय संसद नेसेट में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत है। चुनावी आंकड़ों में नेतन्याहू के गठबंधन को 53, आइसेनकोट के विपक्षी खेमे को 48 और अरब पार्टियों को कुल 19 सीटें मिली हैं। यानी विपक्ष और अरब दलों के बीच तालमेल बनता है तो 67 सांसदों का समर्थन हासिल किया जा सकता है। यही वह गणित है, जिसने नेतन्याहू की राजनीतिक मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को केवल सीटों के जोड़-घटाव के तौर पर देखना सही नहीं होगा। असली सवाल यह है कि क्या इजरायल का विपक्ष अपनी वैचारिक और राजनीतिक दूरियों को मिटाकर अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने का जोखिम उठाएगा? और क्या अरब दल भी केवल नेतन्याहू को हटाने के लिए अपनी राजनीतिक शर्तों से समझौता करेंगे?
Also Read –Delhi Pollution New Rules: नहीं मिलेगा पेट्रोल-डीजल-अगर ये नहीं तो! गाड़ियां बैन और 50% WFH, दिल्ली में 1 नवंबर से प्रदूषण के 5 नए नियम लागू
Israel Election Result 2026: 19 सीटों के सहारे सत्ता परिवर्तन की रणनीति
रिपोर्ट के मुताबिक, जॉइंट लिस्ट के वरिष्ठ सांसद अहमद तिबी ने नेतन्याहू सरकार को हटाने के लिए विपक्ष का समर्थन करने की इच्छा जताई है। हालांकि, उनकी पार्टी नई सरकार में शामिल नहीं होना चाहती। वह बाहर से समर्थन देकर सत्ता परिवर्तन का रास्ता खोलने के पक्ष में है।
तिबी का यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इजरायल की राजनीति में अरब पार्टियों का समर्थन अक्सर निर्णायक साबित हुआ है। उन्होंने गादी आइसेनकोट को दिवंगत प्रधानमंत्री यित्जाक राबिन की तरह राजनीतिक साहस दिखाने की सलाह भी दी है। राबिन ने 1990 के दशक में फिलिस्तीन मुक्ति संगठन के साथ बातचीत और ओस्लो समझौते की दिशा में कदम बढ़ाए थे। उस दौर में भी अरब सांसदों के बाहरी समर्थन ने उनकी सरकार को मजबूती दी थी।
जॉइंट लिस्ट के अध्यक्ष यूसुफ जबरीन की विपक्षी नेताओं के साथ बातचीत भी इसी रणनीति का संकेत देती है। पार्टी जानती है कि उसके 19 सांसद केवल संख्या नहीं, बल्कि सरकार गठन की पूरी प्रक्रिया को प्रभावित करने की ताकत रखते हैं।
नेतन्याहू विरोधी एकजुटता में ही छिपा सबसे बड़ा पेंच
नेतन्याहू को हटाने की इच्छा विपक्षी दलों को एक मंच पर तो ला सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे एक साथ सरकार बनाने के लिए तैयार भी हैं।
नफ्ताली बेनेट और अविग्दोर लिबरमैन जैसे नेताओं का अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने को लेकर विरोध रहा है। दूसरी तरफ यायर गोलान की डेमोक्रेट्स पार्टी अरब दलों के साथ राजनीतिक सहयोग की संभावनाओं को लेकर अपेक्षाकृत सकारात्मक है। खुद आइसेनकोट भी पहले मंसूर अब्बास को अपनी सरकार में शामिल करने के विचार से दूरी बना चुके हैं।
यही विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी है। नेतन्याहू विरोधी होना और नेतन्याहू को हटाने के लिए अरब पार्टियों के साथ सत्ता साझा करने को तैयार होना, दोनों अलग-अलग राजनीतिक स्थितियां हैं।
अगर विपक्षी दल अरब पार्टियों के समर्थन पर सहमत नहीं होते तो 48 सीटों का उनका मौजूदा आंकड़ा सरकार बनाने के लिए नाकाफी रहेगा। दूसरी ओर, अरब पार्टियां भी केवल सत्ता परिवर्तन के नाम पर बिना राजनीतिक शर्तों के समर्थन देने को तैयार होंगी, इसकी गारंटी नहीं है।
नेतन्याहू के लिए खतरा सिर्फ चुनावी हार नहीं, राजनीतिक अलगाव भी
नेतन्याहू के सामने चुनौती केवल बहुमत जुटाने की नहीं है। चुनावी नतीजे यह भी दिखाते हैं कि उनकी राजनीतिक पकड़ पहले जैसी मजबूत नहीं रह गई है। पहले उनके गठबंधन के पास 68 सीटें थीं, जबकि इस बार यह संख्या घटकर 53 रह गई।
यह गिरावट उनके नेतृत्व, सरकार की नीतियों और देश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर मतदाताओं के बीच बढ़ती नाराजगी का संकेत मानी जा सकती है। खासकर 2023 में हमास के हमले के बाद सुरक्षा, युद्ध नीति और सरकार की जवाबदेही जैसे मुद्दे इजरायल की राजनीति के केंद्र में रहे हैं।
हालांकि, नेतन्याहू को अभी पूरी तरह कमजोर मानना भी जल्दबाजी होगी। इजरायल की गठबंधन राजनीति में छोटे दलों का रुख आखिरी समय तक बदल सकता है। नेतन्याहू के पास भी विपक्षी खेमे में मतभेदों का फायदा उठाने और नए राजनीतिक समीकरण बनाने का अवसर है।
अरब पार्टियों के सामने भी बड़ा राजनीतिक इम्तिहान
राआम और जॉइंट लिस्ट के लिए यह केवल नेतन्याहू विरोध का मौका नहीं, बल्कि इजरायल की सत्ता व्यवस्था में अपनी राजनीतिक अहमियत साबित करने का भी समय है।
अरब समुदाय लंबे समय से अपराध, भेदभाव, आवास, विकास और सुरक्षा जैसे मुद्दे उठाता रहा है। ऐसे में इन पार्टियों का समर्थन हासिल करने के लिए आइसेनकोट को भी अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं में कुछ बदलाव करने पड़ सकते हैं।
यहां एक दिलचस्प विरोधाभास भी है। इजरायल की राजनीति में अरब पार्टियों के समर्थन को लेकर दक्षिणपंथी खेमे में विरोध रहा है, लेकिन अब नेतन्याहू विरोधी गठबंधन की सत्ता की उम्मीद भी उन्हीं सांसदों के समर्थन पर टिकी है। यानी जिन दलों के समर्थन को लेकर विपक्ष के भीतर असहजता है, वही दल सत्ता परिवर्तन की सबसे बड़ी संभावना बन गए हैं।
क्या इजरायल में राबिन जैसा राजनीतिक प्रयोग दोहराया जाएगा?
इस पूरे घटनाक्रम में यित्जाक राबिन का उदाहरण बार-बार सामने आना महज संयोग नहीं है। यह विपक्ष की उस रणनीति को दिखाता है, जिसमें वैचारिक मतभेदों के बावजूद साझा राजनीतिक लक्ष्य के लिए बाहरी समर्थन लिया जा सकता है।
लेकिन 1990 के दशक और आज के इजरायल में बड़ा अंतर है। मौजूदा दौर में सुरक्षा और फिलिस्तीन का सवाल कहीं अधिक संवेदनशील है। गाजा युद्ध के बाद राजनीतिक ध्रुवीकरण गहरा हुआ है। ऐसे में अरब दलों के समर्थन से सरकार बनाना केवल संसदीय गणित नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक फैसला होगा।
फिलहाल 67 सीटों का संभावित आंकड़ा नेतन्याहू के लिए खतरे की घंटी जरूर है, लेकिन आइसेनकोट के लिए यह सत्ता तक पहुंचने की गारंटी नहीं। आने वाले दिनों में सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या नेतन्याहू विरोधी दल अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठ पाएंगे?
इजरायल की इस चुनावी लड़ाई में अब मुकाबला सिर्फ नेतन्याहू बनाम विपक्ष नहीं रह गया है। असली लड़ाई इस बात की है कि सत्ता परिवर्तन के लिए कौन कितनी राजनीतिक कीमत चुकाने को तैयार है। और इस बार उस कीमत का फैसला 19 अरब सांसदों के हाथ में दिखाई दे रहा है।