Russia India Defence Deal: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की सरकार भारत को अपने Su-57E स्टील्थ फाइटर जेट (Su-57E Stealth Fighter Jet) बेचने के लिए लगातार कोशिश कर रही है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) के दौरान रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात में भी इस मुद्दे पर प्रमुखता से चर्चा हुई। रूस का प्रस्ताव सिर्फ लड़ाकू विमान बेचने तक सीमित नहीं है। बताया जा रहा है कि रूस भारत को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (Technology Transfer), संयुक्त उत्पादन (Joint Production) और सोर्स कोड (Source Code) तक पहुंच देने का प्रस्ताव भी रख रहा है।
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ऐसे समय में जब भारतीय वायुसेना (Indian Air Force) अपने स्क्वाड्रन संकट से जूझ रही है और चीन-पाकिस्तान की सैन्य ताकत लगातार बढ़ रही है, रूस का यह प्रस्ताव काफी अहम माना जा रहा है। Su-57E को भारत के स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एएमसीए (AMCA) के तैयार होने तक अंतरिम समाधान के तौर पर पेश किया जा रहा है। एएमसीए के करीब 2035 के आसपास सेवा में आने की उम्मीद है। ऐसे में अगले कुछ वर्षों के लिए पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान (Fifth Generation Fighter Jet) की कमी को पूरा करने के लिए Su-57E एक विकल्प बन सकता है।
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Russia India Defence Deal: भारतीय वायुसेना के सामने बड़ा स्क्वाड्रन संकट
भारतीय वायुसेना के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक लड़ाकू विमानों के स्क्वाड्रन की कमी है। वायुसेना के पास वर्तमान में करीब 29 स्क्वाड्रन हैं, जबकि स्वीकृत संख्या 42 स्क्वाड्रन की है। यानी जरूरत के मुकाबले भारतीय वायुसेना के पास लड़ाकू विमानों की संख्या काफी कम है।
दूसरी तरफ पुराने लड़ाकू विमान लगातार रिटायर हो रहे हैं और नए विमानों की आपूर्ति उस गति से नहीं हो रही है, जिसकी जरूरत है। इसका सीधा असर भारत की हवाई ताकत पर पड़ रहा है। खासकर तब जब भारत को एक साथ चीन और पाकिस्तान दोनों मोर्चों पर संभावित चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
यही वजह है कि पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट (Stealth Fighter Jet) की जरूरत पर चर्चा तेज हो गई है। भारत के पास अभी ऐसा कोई पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ लड़ाकू विमान नहीं है, जबकि चीन के पास सैकड़ों जे-20 (J-20) स्टील्थ फाइटर होने की बात सामने आती रही है। वहीं पाकिस्तान भी चीन के जे-35ए (J-35A) हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
चीन-पाकिस्तान की स्टील्थ ताकत ने बढ़ाई चिंता
भारत के लिए चिंता सिर्फ चीन की बढ़ती स्टील्थ क्षमता नहीं है। पाकिस्तान भी पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर हासिल करने की कोशिश कर रहा है। चीन तिब्बत के पास जे-20 लड़ाकू विमानों की तैनाती कर रहा है। ऐसे में भारत के सामने दोनों तरफ से स्टील्थ क्षमता वाली चुनौती खड़ी हो सकती है।
स्टील्थ जेट (Stealth Jet) की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि इन्हें रडार पर पकड़ना मुश्किल होता है। ये दुश्मन के इलाके में अपेक्षाकृत कम पहचान के साथ प्रवेश कर सकते हैं और लंबी दूरी की मिसाइलों से हमला करने की क्षमता रखते हैं। नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर (Network Centric Warfare) में भी ऐसे विमान महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारतीय वायुसेना के पास राफेल (Rafale), सु-30एमकेआई (Su-30MKI) और तेजस (Tejas) जैसे बेहद सक्षम लड़ाकू विमान मौजूद हैं। हालांकि ये विमान चौथी या 4.5 पीढ़ी के हैं। ऐसे विमानों की अपनी मजबूत क्षमताएं हैं, लेकिन स्टील्थ विमानों के खिलाफ पांचवीं पीढ़ी की स्टील्थ क्षमता एक अलग रणनीतिक बढ़त दे सकती है।
Su-57E में क्या खास है?
रूस का Su-57E पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट है। इसमें फ्रंटल स्टील्थ (Frontal Stealth), सुपर मैन्युवरेबिलिटी (Super Maneuverability), थ्रस्ट वेक्टरिंग (Thrust Vectoring) और एडवांस्ड सेंसर फ्यूजन (Advanced Sensor Fusion) जैसी क्षमताएं बताई जाती हैं।
यह विमान हवा से हवा में मार करने वाले मिशन (Air to Air Mission) के साथ-साथ हवा से जमीन पर हमला करने वाले मिशन (Air to Ground Mission) के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। रूस की तरफ से इसे युद्ध में इस्तेमाल का अनुभव रखने वाला विमान भी बताया जाता है।
यानी भारत अगर Su-57E को शामिल करता है तो उसे सिर्फ एक नया फाइटर जेट नहीं मिलेगा, बल्कि पांचवीं पीढ़ी के युद्ध की रणनीति और तकनीक के साथ काम करने का प्रत्यक्ष अनुभव भी हासिल हो सकता है।
कितने Su-57E की जरूरत पड़ सकती है?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत को कितने Su-57E स्टील्थ फाइटर जेट की जरूरत होगी। विशेषज्ञों के अनुसार दो से चार स्क्वाड्रन यानी करीब 36 से 80 विमानों की संख्या पर्याप्त हो सकती है।
कुछ रिपोर्ट्स में 36 से 60 विमानों की तत्काल डिलीवरी और इसके बाद भारत में तीन से पांच स्क्वाड्रन के लिए संयुक्त उत्पादन की संभावना की बात कही गई है। अगर भारत दो स्क्वाड्रन Su-57E खरीदता है तो इससे भारतीय पायलटों को पांचवीं पीढ़ी की रणनीति (Fifth Generation Warfare), स्टील्थ मेंटेनेंस (Stealth Maintenance) और सेंसर फ्यूजन (Sensor Fusion) जैसी तकनीकों का अनुभव हासिल करने का मौका मिलेगा।
वहीं चार स्क्वाड्रन शामिल करने पर भारत को फ्रंटलाइन पर ज्यादा मजबूत स्टील्थ क्षमता मिल सकती है। इससे एएमसीए के आने तक का अंतर भी काफी हद तक कवर किया जा सकता है।
हालांकि बड़ी संख्या में विदेशी स्टील्थ फाइटर खरीदने का दूसरा पहलू भी है। ज्यादा विमान खरीदने पर रक्षा बजट (Defence Budget) पर दबाव बढ़ेगा और इसका असर स्वदेशी एएमसीए कार्यक्रम पर भी पड़ सकता है। इसलिए भारत के लिए छोटी संख्या में तत्काल खरीद और सीमित संयुक्त उत्पादन का विकल्प ज्यादा संतुलित माना जा सकता है।
रूस दे रहा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का बड़ा ऑफर
Su-57E प्रस्ताव की सबसे खास बात सिर्फ विमान की खरीद नहीं बल्कि इसके साथ मिलने वाली तकनीकी साझेदारी है। रूस भारत को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (Technology Transfer), संयुक्त उत्पादन (Joint Production) और सोर्स कोड (Source Code) तक पहुंच देने का प्रस्ताव रख रहा है।
अगर यह तकनीकी साझेदारी आगे बढ़ती है तो भारतीय रक्षा उद्योग (Indian Defence Industry) को स्टील्थ कोटिंग (Stealth Coating), एवियोनिक्स (Avionics), इंजन (Engine) और हथियारों के एकीकरण (Weapon Integration) जैसी तकनीकों में अनुभव मिल सकता है।
भारत के लिए इसका सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि पांचवीं पीढ़ी की तकनीक से जुड़ा अनुभव भविष्य के स्वदेशी कार्यक्रमों में इस्तेमाल किया जा सके। खासकर एएमसीए के विकास में इस तरह की तकनीकी समझ काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
अस्त्र मिसाइल को भी मिल सकता है फायदा
रूस की पेशकश में भारतीय हथियारों को Su-57E के साथ एकीकृत करने का विकल्प भी महत्वपूर्ण है। भारतीय अस्त्र मिसाइल (Astra Missile) को विमान के साथ एकीकृत करने की संभावना से भारत को अपनी मौजूदा हथियार प्रणालियों का इस्तेमाल पांचवीं पीढ़ी के प्लेटफॉर्म के साथ करने का मौका मिल सकता है।
इससे भारत की विदेशी हथियार प्रणालियों पर निर्भरता कम करने की दिशा में मदद मिल सकती है। साथ ही मेक इन इंडिया (Make in India) और स्वदेशी रक्षा उत्पादन (Indigenous Defence Production) को भी बढ़ावा मिल सकता है।
रूस के साथ पुराना अनुभव भी आएगा काम
भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग काफी पुराना है। भारतीय वायुसेना लंबे समय से रूसी मूल के लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल करती रही है। सु-30एमकेआई इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
ऐसे में Su-57E को शामिल करने पर प्रशिक्षण, लॉजिस्टिक्स (Logistics) और रखरखाव की कुछ प्रक्रियाओं में भारतीय वायुसेना को पहले से मौजूद रूसी प्लेटफॉर्म के अनुभव का फायदा मिल सकता है।
इसके अलावा Su-57E लंबी दूरी के मिशन (Long Range Mission), दुश्मन की एयर डिफेंस (Air Defence) को भेदने और वायु श्रेष्ठता (Air Superiority) हासिल करने में उपयोगी हो सकता है। चीन और पाकिस्तान की बढ़ती स्टील्थ क्षमता के बीच ऐसी क्षमता भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है।
रूस के प्रस्ताव में चुनौतियां भी
Su-57E का प्रस्ताव जितना आकर्षक दिखाई देता है, इसमें कई चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी चिंता रूस की उत्पादन क्षमता को लेकर है। अगर भारत को तत्काल बड़ी संख्या में विमान चाहिए तो रूस कितनी तेजी से इन विमानों की आपूर्ति कर पाएगा, यह महत्वपूर्ण सवाल रहेगा।
इसके अलावा रूस पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध (International Sanctions) भी रक्षा आपूर्ति और स्पेयर पार्ट्स की व्यवस्था के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं। विमान खरीदने के बाद लंबे समय तक इसके रखरखाव और सपोर्ट की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।
दूसरी बड़ी चिंता एएमसीए को लेकर है। अगर भारत Su-57E की बड़ी संख्या खरीद लेता है तो इससे स्वदेशी एएमसीए कार्यक्रम के लिए उपलब्ध बजट और संसाधनों पर दबाव पड़ सकता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी स्टील्थ जेट की खरीद कहीं न कहीं स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान की देरी को स्वीकार करने जैसा भी संदेश दे सकती है।
इसलिए भारत के लिए सबसे अहम बात यह होगी कि Su-57E को स्थायी विकल्प नहीं बल्कि एक पुल के तौर पर इस्तेमाल किया जाए।
AMCA आने तक बन सकता है रणनीतिक पुल
एएमसीए के करीब 2035 के आसपास सेवा में आने की उम्मीद है। अगर यह समयसीमा बनी रहती है तो भारत के सामने उससे पहले के वर्षों में पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर की कमी बनी रह सकती है।
यहीं पर Su-57E अंतरिम समाधान के तौर पर भूमिका निभा सकता है। 36 से 60 विमानों की शुरुआती खरीद से भारत को तत्काल स्टील्थ क्षमता मिल सकती है। इसके साथ ही भारतीय पायलटों और तकनीकी विशेषज्ञों को पांचवीं पीढ़ी की तकनीक का अनुभव भी हासिल होगा।
बाद में अगर संयुक्त उत्पादन और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की व्यवस्था आगे बढ़ती है तो इससे भारतीय उद्योग को भी फायदा मिल सकता है। लेकिन इसका अंतिम लक्ष्य एएमसीए को मजबूत और समय पर तैयार करना ही होना चाहिए।
भारत के लिए छोटा लेकिन रणनीतिक सौदा?
भारत के सामने असल चुनौती यह है कि उसे तत्काल जरूरत और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता के बीच संतुलन बनाना होगा। चीन के पास बड़ी संख्या में जे-20 हैं और पाकिस्तान भी जे-35ए जैसी स्टील्थ क्षमता हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे में भारत के पास पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर की कमी लंबे समय तक नहीं रह सकती।
Su-57E इस कमी को तेजी से भरने का विकल्प दे सकता है। दो से चार स्क्वाड्रन की सीमित संख्या में खरीद भारत को पांचवीं पीढ़ी की क्षमता का अनुभव और रणनीतिक प्रतिरोधक क्षमता दोनों दे सकती है।
लेकिन अगर खरीद बहुत बड़ी हो गई तो इसका असर एएमसीए पर पड़ सकता है। इसलिए भारत के लिए सबसे संतुलित रास्ता यही हो सकता है कि सीमित संख्या में Su-57E हासिल किए जाएं, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और संयुक्त उत्पादन का अधिकतम फायदा लिया जाए और साथ ही एएमसीए के विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
असली लक्ष्य सिर्फ स्टील्थ जेट खरीदना नहीं
भारत के लिए Su-57E का मुद्दा सिर्फ एक विदेशी लड़ाकू विमान खरीदने का सवाल नहीं है। यह आने वाले वर्षों में भारतीय वायुशक्ति (Indian Air Power) की दिशा तय करने वाला फैसला हो सकता है।
चीन और पाकिस्तान की बढ़ती स्टील्थ क्षमता के बीच 36 से 60 Su-57E भारत को तत्काल रणनीतिक बढ़त दे सकते हैं। वहीं रूस से मिलने वाली तकनीकी साझेदारी भारतीय रक्षा उद्योग को पांचवीं पीढ़ी की तकनीक समझने में मदद कर सकती है।
लेकिन लंबी अवधि में भारत की सुरक्षा स्वदेशी क्षमता पर ही निर्भर करेगी। इसलिए Su-57E को अगर एएमसीए तक पहुंचने के लिए एक रणनीतिक पुल की तरह इस्तेमाल किया जाता है तो यह भारत के लिए फायदेमंद हो सकता है। भारत को ऐसा फैसला लेना होगा जिसमें तत्काल सुरक्षा जरूरत भी पूरी हो और स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान का लक्ष्य भी कमजोर न पड़े। आखिरकार यह सिर्फ एक फाइटर जेट खरीदने का मामला नहीं है, बल्कि आने वाले समय की भारतीय हवाई ताकत तय करने का सवाल है।