Vande Mataram controversy: राष्ट्रगीत (National Song) ‘वंदे मातरम्’ को लेकर BJP और Congress के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर लगातार जारी है। लेकिन अब यह मुद्दा केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि कानूनी पहलू भी इससे जुड़ गया है। जुलाई 2026 में राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण संशोधन अधिनियम (National Honour Amendment Act) में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान, राष्ट्रीय ध्वज और संविधान की तरह कानूनी संरक्षण दिया गया है। इसके बाद गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) ने वंदे मातरम् के गायन और बजाने से जुड़े नियम भी अधिसूचित किए हैं।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कोई संस्था या राजनीतिक दल अपनी पुरानी परंपरा के अनुसार वंदे मातरम् के कुछ ही हिस्से गाता है, तो क्या कानून लागू होने के बाद भी ऐसा किया जा सकता है।
दी गई जानकारी के अनुसार, कानून में संरक्षण मिलने के बाद मनमाने तरीके से राष्ट्रीय गीत के स्वरूप या निर्धारित गायन में परिवर्तन करना उचित नहीं माना जा सकता है।
Vande Mataram controversy: वंदे मातरम् के पूरे संस्करण को लेकर क्या है नियम
राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को संसद में पारित कानून के अंतर्गत कानूनी संरक्षण मिलने के बाद इसके गायन को लेकर भी नियम निर्धारित किए गए हैं। (Vande Mataram controversy) गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के मुताबिक वंदे मातरम् के सभी 6 छंदों या छह अंतरों के पूर्ण संस्करण को गाने या बजाने की निर्धारित अवधि 3 मिनट 10 सेकंड यानी 190 सेकंड है।
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इसका अर्थ यह है कि राष्ट्रीय गीत के पूर्ण संस्करण के लिए एक निर्धारित अवधि तय की गई है। दी गई जानकारी के मुताबिक, इसमें किसी तरह की बाधा या परिवर्तन राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण संशोधन अधिनियम, 2026 के उल्लंघन के दायरे में आ सकता है।
क्या कोई संस्था या पार्टी अपनी परंपरा के अनुसार गा सकती है
यही सवाल इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। आजादी से पहले स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वर्ष 1937 में कांग्रेस ने वंदे मातरम् के शुरुआती दो छंदों को मान्यता दी थी। इसी के कारण यह थी कि मूल गीत 6 छंदों का था और बाद के हिस्सों को लेकर राजनीतिक और साम्प्रदायिक दृष्टिकोण से मतभेद मौजूद थे।
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इस कारण से लंबे वक़्त तक वंदे मातरम् के शुरुआती दो छंदों के गायन की परंपरा बनी रही। हालांकि, इससे पहले छह छंद भी गाए जाते थे। अब स्थिति इसलिए बदल गई है क्योंकि जुलाई 2026 में कानून के माध्यम से राष्ट्रीय गीत को कानूनी संरक्षण दिया गया है।
कानूनविदों के मुताबिक, जब किसी विषय को कानून के दायरे में लाया जाता है तो सिर्फ पुरानी परंपरा का हवाला देकर कानून से अलग व्यवस्था नहीं अपनाई जा सकती। यानी यदि पहले किसी संस्था, संगठन या राजनीतिक दल में वंदे मातरम् के कुछ चुनिंदा अंतरे गाने की परंपरा रही है, तो कानून लागू होने के बाद उस परंपरा को कानून से ऊपर नहीं रखा जा सकता है।
वंदे मातरम् को कब मिला राष्ट्रगान के समान सम्मान
वंदे मातरम् (Vande Mataram) की रचना लगभग 150 साल पहले हुई थी। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 को राष्ट्रगीत वंदे मातरम् की रचना की थी। बाद में इसे साल 1882 में प्रकाशित उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया।
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित मूल वंदे मातरम् में कुल छह छंद या पद थे। ‘आनंदमठ’ के प्रकाशन के बाद यह गीत बड़े स्तर पर लोगों तक पहुंचा। जिस प्रसंग में इसे उपन्यास में शामिल किया गया था, वह राष्ट्रभक्ति की भावना से जुड़ा हुआ था। इसी कारण से वंदे मातरम् स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रवाद की भावना का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
अंग्रेजी शासन के दौरान वंदे मातरम् और इसके नारे को लेकर भी विरोध हुआ और इस पर प्रतिबंध लगाया गया। इसके बाद भी स्वतंत्रता आंदोलन में इस गीत का महत्व बना रहा।
24 जनवरी 1950 को मिला समान सम्मान
स्वतंत्र भारत में वंदे मातरम् को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय 24 जनवरी 1950 को हुआ। उस समय संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ। राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम् को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान सम्मान दिए जाने की घोषणा की। साउथएशियन कल्चरल इवेंट्स खोजना
ऐलान में वंदे मातरम् की स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका को अहम माना गया था। इस तरह वंदे मातरम् को राष्ट्रगान के समान दर्जा और सम्मान देने की बात सामने आई। हालांकि, इसके गायन की अवधि और कितने अंतरे गाए जाएं, इसे लेकर 30 जुलाई 2026 से पहले तक कोई निर्धारित कानूनी व्यवस्था नहीं थी।
जुलाई 2026 में कानून बनने के बाद क्या बदला
राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण संशोधन अधिनियम, 2026 संसद द्वारा जुलाई 2026 में पारित किया गया। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून लागू हुआ। इस कानून के माध्यम राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 में संशोधन किया गया।
इस संशोधन के बाद राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को भी राष्ट्रगान ‘जन गण मन’, राष्ट्रीय ध्वज और संविधान की तरह कानूनी संरक्षण देने की व्यवस्था की गई। मूल कानून की धारा 3 में संशोधन करके अब राष्ट्रगान के साथ राष्ट्रीय गीत को भी इसमें शामिल किया गया है।
यही परिवर्तन वंदे मातरम् को लेकर मौजूदा विवाद को कानूनी रूप से अहम बनाता है। पहले जहां इसके गायन को लेकर अलग-अलग परंपराएं थीं, वहीं अब कानून में इसके लिए संरक्षण का स्पष्ट प्रावधान जोड़ा गया है।
वंदे मातरम् के गायन में बाधा डालने पर क्या होगा
संशोधित कानून के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर वंदे मातरम् या राष्ट्रगान के गायन को रोकता है अथवा गायन के दौरान सभा में बाधा उत्पन्न करता है, तो इसे दंडनीय अपराध माना जाएगा।
ऐसे अपराध के लिए तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान किया गया है। इसका मकसद राष्ट्रीय प्रतीकों (National Symbols) के सम्मान को सुनिश्चित करना और उनके अपमान के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का दायरा बढ़ाना बताया गया है।
क्या पुरानी परंपरा और नया कानून टकरा सकते हैं
वंदे मातरम् के शुरुआती दो छंद गाने की परंपरा स्वतंत्रता आंदोलन के वक़्त से जुड़ी हुई है। साल 1937 में कांग्रेस की तरफ से शुरुआती दो छंदों को मान्यता दिए जाने के पीछे बाद के अंशों को लेकर मौजूद राजनीतिक और साम्प्रदायिक मतभेद बताए जाते हैं।
लेकिन अब राष्ट्रीय गीत को कानून के तहत संरक्षण मिलने के बाद सवाल यह है कि पुरानी परंपरा को किस हद तक जारी रखा जा सकता है। दी गई जानकारी और कानूनविदों की व्याख्या के मुताबिक, कानून लागू होने के बाद कोई भी संस्था या राजनीतिक दल अपनी सुविधा के अनुसार ऐसी व्यवस्था नहीं अपना सकता जो कानून के प्रावधानों के विपरीत हो।
यानी वंदे मातरम् को लेकर बहस अब सिर्फ इस बात पर नहीं है कि कौन से अंतरे गाए जाएं, बल्कि यह भी सवाल जुड़ गया है कि राष्ट्रीय गीत को मिले नए कानूनी संरक्षण का पालन कैसे किया जाए। यही वजह है कि कांग्रेस की तरफ से वंदे मातरम् पूरा नहीं गाने की बात अब राजनीतिक बहस के साथ कानूनी चर्चा का विषय भी बन गई है।
संशोधन का क्या है महत्व
राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण संशोधन अधिनियम, 2026 का महत्व इस लिहाज से बताया जा रहा है कि इसने स्वतंत्रता संग्राम में वंदे मातरम् के ऐतिहासिक योगदान और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में इसके सम्मान को कानूनी मान्यता दी है।
इस संशोधन के बाद राष्ट्रीय गीत भी उन राष्ट्रीय प्रतीकों के कानूनी संरक्षण के दायरे में आ गया है, जिनके सम्मान और अपमान को लेकर कानून में प्रावधान मौजूद हैं। इसलिए अब वंदे मातरम् को लेकर किसी भी संस्था या राजनीतिक दल की पुरानी परंपरा और नए कानूनी प्रावधान के बीच संतुलन का सवाल बहुत ही अहम हो गया है।
कुल मिलाकर, वंदे मातरम् को लेकर जारी राजनीतिक विवाद अब कानून के दायरे में भी पहुंच गया है। जुलाई 2026 के संशोधन के बाद राष्ट्रीय गीत को कानूनी संरक्षण मिलने से इसके गायन, निर्धारित अवधि और सम्मान से जुड़े नियम पहले की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं।