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Fish Politics Bengal: वेस्ट बंगाल में ‘मछली पर महायुद्ध! TMC के ‘चुनावी जाल’ में फंस गई BJP, जानें फिश पॉलिटिक्स का गणित

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Fish Politics Bengal: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के प्रचार में इस बार एक अनोखा और दिलचस्प मुद्दा सामने आया है मछली। बंगाल की राजनीति में जहां आमतौर पर विकास, रोजगार और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे हावी रहते हैं, वहीं इस बार “फिश पॉलिटिक्स” ने चुनावी माहौल को नया रंग दे दिया है। (Fish Politics Bengal) तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) द्वारा भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को “बाहरी” यानी गैर-बंगाली पार्टी बताने के बाद अब बीजेपी नेता मछली के साथ प्रचार करते नजर आ रहे हैं।

Fish Politics Bengal: बीजेपी बंगाल की संस्कृति से अनजान

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य, दक्षिण कोलकाता की रासबिहारी सीट से उम्मीदवार स्वप्न दासगुप्ता और शिबपुर से उम्मीदवार व अभिनेता रुद्रनील घोष सार्वजनिक रूप से मछली खाते हुए दिखाई दिए। वहीं बिधाननगर सीट से उम्मीदवार शरदवत मुखोपाध्याय तो एक बड़ी मछली लेकर ही चुनाव प्रचार में उतर गए, जिससे यह मुद्दा और सुर्खियों में आ गया। (Fish Politics Bengal) दरअसल, इस पूरे विवाद की शुरुआत फरवरी में हुई, जब बिहार के डिप्टी सीएम विजय सिन्हाने बिना लाइसेंस मांस बिक्री पर रोक लगाने और धार्मिक व शैक्षणिक संस्थानों के आसपास मांस-मछली की दुकानों को सीमित करने की बात कही थी। हालांकि यह बयान बिहार तक सीमित रहा, लेकिन टीएमसी ने इसे बंगाल की राजनीति में मुद्दा बना दिया। 17 फरवरी को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनावी सभा में कहा कि अगर बीजेपी सत्ता में आती है, तो बंगाल में मछली और मांस की बिक्री पर रोक लग सकती है। उन्होंने बीजेपी को बंगाल की संस्कृति से अनजान “बाहरी पार्टी” बताया।

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टीएमसी ने मछली को बंगाली अस्मिता से जोड़ते हुए तैयार किया मजबूत नैरेटिव

इसके बाद टीएमसी ने मछली को बंगाली अस्मिता और संस्कृति से जोड़ते हुए एक मजबूत नैरेटिव तैयार किया। पार्टी के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भी आरोप लगाया कि बीजेपी सत्ता में आई तो लोगों के खानपान पर पाबंदी लगा सकती है। (Fish Politics Bengal) उन्होंने यहां तक कहा कि बीजेपी नेताओं का स्वागत मछली, मांस और अंडे के व्यंजनों से किया जाना चाहिए, ताकि उन्हें बंगाल की संस्कृति का अहसास हो सके। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में मछली सिर्फ एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। दुर्गा पूजा जैसे बड़े त्योहारों में मांसाहारी भोजन परंपरा का हिस्सा होता है। ऐसे में मछली का मुद्दा केवल खानपान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक और भावनात्मक जुड़ाव से भी जुड़ा हुआ है। यह मुद्दा खासतौर पर भद्रलोक वर्ग और एससी-एसटी समुदाय के बीच भी राजनीतिक संदेश देने का काम कर सकता है।

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टीएमसी ने बीजेपी पर यह आरोप भी लगाया कि वह बंगाल की परंपराओं को नहीं समझती। कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में एक कार्यक्रम के दौरान चिकन पैटी बेचने वाले फेरीवालों के साथ हुई मारपीट को भी इस नैरेटिव से जोड़ा गया। (Fish Politics Bengal) इसके अलावा बीजेपी की परिवर्तन यात्रा के समापन कार्यक्रम में दिए गए भोजन में मछली नहीं होने को भी मुद्दा बनाया गया। हालांकि बीजेपी ने इस आरोपों का जवाब अपने अंदाज में दिया। पार्टी नेताओं ने खुद मछली के साथ प्रचार करना शुरू कर दिया और यह संदेश देने की कोशिश की कि वे बंगाल की संस्कृति से पूरी तरह परिचित हैं। समिक भट्टाचार्य ने कहा कि कोई भी बंगाली बिना मछली और मटन के नहीं रह सकता। वहीं शरदवत मुखोपाध्याय ने टीएमसी पर गलत जानकारी फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा कि बीजेपी किसी के खानपान में दखल नहीं देती। (Fish Politics Bengal) पश्चिम बंगाल का यह चुनाव अब केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सांस्कृतिक प्रतीकों के जरिए जनता तक पहुंचने की कोशिश भी तेज हो गई है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि “मछली की राजनीति” मतदाताओं को कितना प्रभावित करती है।

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