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Kerala political controversy: ‘तुष्टिकरण’ की राजनीति कर रही कांग्रेस… केरल के वोट बैंक की जंग में ‘जमात’ बना ट्रंप कार्ड! LDF-BJP ने खोला मोर्चा
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1 घंटा agoon

Kerala political controversy: केरल की राजनीति में आने वाले चुनावों से पहले एक नया और बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस नेता और विपक्ष के नेता वी.डी. सतीशन के उस बयान के बाद सियासी माहौल गरमा गया है, जिसमें उन्होंने कहा “अगर जमात-ए-इस्लामी संविधान को स्वीकार करती है और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध है, तो उसके समर्थन को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है। इस बयान ने राज्य की राजनीति में कांग्रेस, LDF और BJP के बीच एक तगड़ी बहस को जन्म दे दिया है।
Kerala political controversy: क्या है पूरा मामला?
हाल ही में कासरगोड़ में आयोजित एक कार्यक्रम के बाद वी.डी. सतीशन ने मीडिया से बातचीत में कहा कि जमात-ए-इस्लामी ने सार्वजनिक रूप से यह एलान किया है कि वह शरिया आधारित राज्य की अवधारणा का समर्थन नहीं करती और भारतीय संविधान को मानती है। (Kerala political controversy) ऐसे में अगर कोई संगठन लोकतांत्रिक प्रक्रिया में थोड़ा भी विश्वास जताता है, तो उसके समर्थन को अस्वीकार करने का कोई सवाल ही नहीं उठता।
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सतीशन के इस बयान के तत्काल बाद BJP और सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) ने कांग्रेस पर निशाना साधा। BJP नेताओं ने आरोप लगाया कि कांग्रेस “तुष्टिकरण की राजनीति” कर रही है और कट्टरपंथी संगठनों को वैधता दे रही है। (Kerala political controversy) वहीं मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और CPM नेताओं ने भी कांग्रेस की मंशा पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि सत्ता के लिए कांग्रेस सांप्रदायिक ताकतों के साथ समझौता कर रही है।
कांग्रेस का पलटवार
इन आरोपों के जवाब में कांग्रेस ने LDF को भी कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया। (Kerala political controversy) सतीशन ने कहा कि वामपंथी दलों का जमात-ए-इस्लामी और उससे जुड़े संगठनों के साथ अतीत में राजनीतिक स्तर पर संवाद और सहयोग रहा है। ऐसे में कांग्रेस को कटघरे में खड़ा करना “राजनीतिक पाखंड” है। उन्होंने यह भी कहा कि केरल में अलग-अलग विभिन्न समुदायों के संगठनों से संवाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया का भाग है।
कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि अगर कोई संगठन सार्वजनिक रूप से संविधान और लोकतांत्रिक ढांचे को स्वीकार करता है, तो उसे मुख्यधारा की राजनीति से बाहर रखना उचित नहीं होगा। (Kerala political controversy) उनका कहना है कि समर्थन लेना और वैचारिक सहमति देना दो अलग-अलग बातें हैं।
जमात-ए-इस्लामी की भूमिका
जमात-ए-इस्लामी हिंद का केरल में सीमित लेकिन प्रभावशाली सामाजिक आधार माना जाता है, विशेषकर कुछ मुस्लिम बहुल जिलों में। संगठन ने हाल के के बीते सालों में खुद को सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में एक लोकतांत्रिक इकाई के रूप में पेश करने का पूरा प्रयास किया है। (Kerala political controversy) उसके राजनीतिक मोर्चे के रूप में वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया (WPI) सक्रिय रही है, जिसने अलग-अलग चुनावों में विभिन्न दलों को समर्थन दिया है।
हालांकि, संगठन के अतीत और उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि को लेकर राजनीतिक दलों में मतभेद रहे हैं। BJP लंबे वक़्त से जमात और उससे जुड़े संगठनों पर कट्टरपंथी विचारधारा को बढ़ावा देने का आरोप लगाती रही है। (Kerala political controversy) वहीं जमात का दावा है कि वह संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अंतरत कार्य कर रही है।
चुनावी गणित और वोट बैंक की राजनीति
इसे लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरा विवाद आगामी विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। केरल की 140 सदस्यीय विधानसभा में कई सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटर्स का प्रभाव निर्णायक माना जाता है। ऐसे में UDF (कांग्रेस नेतृत्व वाला गठबंधन) और LDF दोनों ही समुदायों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के प्रयास में जुटे हुए हैं।
BJP भी पिछले कुछ चुनावों में राज्य में अपने वोट शेयर में बढ़ोतरी का दावा करती रही है। ऐसे में पारंपरिक वोट समीकरणों में परिवर्तन की आशंका से अन्य दलों की रणनीतियों में भी बदलाव देखा जा रहा है।
LDF और BJP की रणनीति
LDF कांग्रेस पर हमलावर है, लेकिन विपक्ष का कहना है कि वामपंथी दल भी समय-समय पर विभिन्न मुस्लिम संगठनों के साथ स्थानीय स्तर पर मेलजोल करते रहे हैं। (Kerala political controversy) BJP इस पूरे मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा और वैचारिक स्पष्टता से जोड़कर पेश कर रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि “कट्टरपंथी पृष्ठभूमि” वाले संगठनों के साथ किसी भी तरह का राजनीतिक सहयोग गंभीर चिंता का विषय है।
अब आगे क्या?
फिलहाल केरल की राजनीति में यह मुद्दा गरमाया हुआ है। (Kerala political controversy) कांग्रेस अपने रुख पर कायम है कि लोकतंत्र में संवाद और समर्थन स्वाभाविक प्रक्रिया है, बशर्ते संगठन संविधान के प्रति प्रतिबद्ध हो। वहीं LDF और BJP इस मुद्दे को चुनावी मंचों पर उठाने की तैयारी में हैं।
बता दे, यह पूरी तरह से साफ़ है कि आगामी कुछ महीनों में यह विवाद और गहराएगा। केरल की सियासत में सांप्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता और चुनावी रणनीति का यह संगम राज्य के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
