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Parliament Monsoon Session 2026: 20 जुलाई से संसद का रण! राम मंदिर दान विवाद से लेकर दल-बदल तक… क्या मानसून सत्र बनेगा 2027 की सियासी जंग का ट्रेलर?

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Parliament Monsoon Session 2026: 20 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में सियासी घमासान रहने के आसार हैं। इस बार मानसून सत्र केवल विधायी कामकाज तक सीमित नहीं रहने वाला बल्कि मौजूदा ववक्त के ज्वलंत मुद्दों पर विपक्ष सरकार पर हमलावर हो सकता है। 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चलने वाले इस सत्र में सत्ता और विपक्ष के बीच ऐसी राजनीतिक टक्कर देखने को मिल सकती है, जो आने वाले चुनावी समीकरणों की दिशा तय करने वाली साबित हो सकती है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने सत्र की तारीखों का ऐलान कर दिया है, लेकिन सियासी गलियारों में चर्चा अब उन मुद्दों की है जिन पर संसद का पारा चढ़ने वाला है।

Parliament Monsoon Session 2026: 130वें संविधान संशोधन विधेयक क्यों है खास?

सरकार एक तरफ अपने महत्वाकांक्षी विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने की तैयारी में है, वहीं विपक्ष ने भी सरकार को घेरने के लिए कई ऐसे मुद्दे तैयार कर लिए हैं जिनका असर संसद से लेकर सड़क तक दिखाई दे सकता है। (Parliament Monsoon Session 2026) सबसे ज्यादा चर्चा प्रस्तावित 130वें संविधान संशोधन विधेयक की है। रिपोर्टों के अनुसार, इस विधेयक में ऐसा प्रावधान लाने की तैयारी है कि यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई मंत्री जेल जाने के बाद 30 दिनों के भीतर जमानत हासिल नहीं कर पाता, तो उसे पद छोड़ना होगा। यदि यह विधेयक संसद में आता है, तो इसके संवैधानिक और राजनीतिक दोनों पहलुओं पर तीखी बहस होना तय माना जा रहा है। सरकार संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण को लागू करने की दिशा में भी नया प्रयास कर सकती है। इसके साथ ही लंबे समय से विवादों में रहे परिसीमन (डिलिमिटेशन) के मुद्दे पर भी सरकार की रणनीति विपक्ष की परीक्षा लेने वाली होगी।

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राम मंदिर चढ़ावा गबन समेत कई मुद्दों पर रहेगी नजर

दूसरी ओर विपक्ष के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार अयोध्या राम मंदिर में कथित दान चोरी का मामला बन सकता है। विपक्ष इस मुद्दे को केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि सरकार और उससे जुड़े संगठनों की जवाबदेही के सवाल के रूप में उठाने की तैयारी में है। (Parliament Monsoon Session 2026) यदि यह मुद्दा संसद में जोर पकड़ता है, तो सत्ता पक्ष के लिए लगातार जवाब देना चुनौती बन सकता है। इसके अलावा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का मुद्दा भी विपक्ष के एजेंडे में शामिल रहने की संभावना है। ऐसे में संसद के भीतर सरकार को कई मोर्चों पर एक साथ जवाब देना पड़ सकता है।

इस बार सदन का राजनीतिक गणित भी पहले जैसा नहीं रहेगा। तृणमूल कांग्रेस (TMC) और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) से जुड़े कथित दल-बदल के मामलों ने लोकसभा की तस्वीर बदल दी है। अब सभी की निगाहें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पर होंगी, जिन्हें टीएमसी के 20 बागी सांसदों के NCPI में प्रस्तावित विलय और उद्धव गुट के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे की शिवसेना में प्रस्तावित विलय पर फैसला लेना है। (Parliament Monsoon Session 2026) इन निर्णयों का असर केवल संसद की संख्या पर नहीं, बल्कि विपक्ष की रणनीति और भविष्य की राजनीतिक धुरी पर भी पड़ सकता है। इसी बीच डीएमके द्वारा लोकसभा में कांग्रेस से अलग बैठने की मांग ने विपक्षी एकजुटता को लेकर भी नई चर्चाओं को जन्म दिया है। हालांकि इस मांग के राजनीतिक कारणों पर अभी सार्वजनिक रूप से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

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मानसून सत्र बनेगा राजनीतिक संघर्षों का अड्डा?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मानसून सत्र केवल विधेयकों के पारित होने का मंच नहीं होगा, बल्कि यह सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए राजनीतिक संदेश देने का सबसे बड़ा अवसर भी साबित हो सकता है। (Parliament Monsoon Session 2026) सरकार अपने विधायी एजेंडे और राजनीतिक मजबूती का प्रदर्शन करना चाहेगी, जबकि विपक्ष राम मंदिर दान विवाद, विशेषाधिकार के मुद्दे और अन्य जनहित के सवालों के जरिए सरकार को घेरने की पूरी कोशिश करेगा। ऐसे में 20 जुलाई से शुरू होने वाला संसद का मानसून सत्र केवल संसदीय कार्यवाही नहीं, बल्कि आने वाले राजनीतिक संघर्षों और चुनावी रणनीतियों का शुरुआती संकेत भी बन सकता है।

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