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Cardiac Arrest Survivor: 3 बार रुका दिल, 122 दिन मौत से जंग… आखिरकार जीतकर घर लौटा 14 साल का बेटा
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3 घंटे agoon
Cardiac Arrest Survivor: दिल्ली के स्वामी दयानंद अस्पताल (SDNH) में डॉक्टरों ने एक 14 वर्षीय बच्चे की जान बचाकर मिसाल पेश की है। कई महीनों तक चले इलाज के बाद यह बच्चा अब पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने घर लौट चुका है। इलाज के दौरान उसे कई बार ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा, जब उसकी जान बचाना बेहद कठिन हो गया था।
Cardiac Arrest Survivor: कमजोरी से शुरू हुई बीमारी, फिर बंद हो गई सांस
बच्चे की मां के अनुसार शुरुआत में उसे सामान्य दस्त की शिकायत हुई थी। कुछ दिनों बाद उसके पैरों में कमजोरी महसूस होने लगी। धीरे-धीरे वह चलने में असमर्थ हो गया और फिर हाथों की ताकत भी कम होने लगी। कुछ ही समय में बीमारी इतनी बढ़ गई कि उसकी सांस लेने वाली मांसपेशियां भी प्रभावित हो गईं और वह खुद से सांस नहीं ले सका। परिजन उसे पहले जीटीबी अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने शुरुआती इलाज शुरू किया। हालत में सुधार नहीं होने पर उसे वेंटिलेटर सपोर्ट के साथ स्वामी दयानंद अस्पताल के आईसीयू में भर्ती किया गया।
दुर्लभ बीमारी ने बढ़ाई मुश्किल
डॉक्टरों ने जांच में पाया कि बच्चा गिलेन-बैरे सिंड्रोम (GBS) के गंभीर रूप ‘एक्यूट मोटर एक्सोनल न्यूरोपैथी (AMAN)’ से पीड़ित है। इस बीमारी में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से नसों पर हमला करने लगती है, जिससे शरीर के अंग धीरे-धीरे काम करना बंद कर देते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक यह बीमारी दुर्लभ होती है और गंभीर मामलों में मरीज को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ सकती है।
तीन बार रुका दिल, डॉक्टरों ने नहीं मानी हार
इलाज के दौरान बच्चे की हालत कई बार बेहद गंभीर हो गई। अस्पताल के अनुसार उसे तीन बार कार्डियक अरेस्ट आया, यानी उसका दिल कुछ समय के लिए धड़कना बंद हो गया। हर बार डॉक्टरों की टीम ने तुरंत सीपीआर (CPR) देकर उसकी धड़कन वापस शुरू की और उसे मौत के मुंह से बाहर निकाला।
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डॉक्टरों का कहना है कि सही समय पर इलाज और लगातार निगरानी की वजह से उसकी जान बचाई जा सकी।
संक्रमण ने भी बढ़ाई परेशानी
आईसीयू में भर्ती रहने के दौरान बच्चे को कई तरह के गंभीर संक्रमण भी हुए। कुछ खतरनाक बैक्टीरिया ने उसके फेफड़ों और शरीर को प्रभावित किया। लंबे समय तक बिस्तर पर रहने की वजह से शरीर में घाव बनने लगे और मांसपेशियां भी कमजोर हो गईं। बाद में उसे दौरे (सीजर) भी आए, जिसके लिए न्यूरोलॉजी विशेषज्ञों की मदद ली गई। इन सभी चुनौतियों के बावजूद डॉक्टरों ने इलाज जारी रखा और धीरे-धीरे उसकी हालत में सुधार होने लगा।
पांच विभागों ने मिलकर किया इलाज
अस्पताल के अनुसार इस बच्चे की रिकवरी किसी एक डॉक्टर की नहीं, बल्कि कई विभागों के संयुक्त प्रयास का नतीजा है।
आईसीयू और बाल रोग विशेषज्ञों ने लगातार निगरानी रखी।
ईएनटी और एनेस्थीसिया टीम ने सांस की नली का सुरक्षित प्रबंधन किया।
फिजियोथेरेपिस्ट ने रोजाना एक्सरसाइज कराकर शरीर की ताकत वापस लाने में मदद की।
सर्जरी और त्वचा रोग विशेषज्ञों ने बेड सोर का इलाज किया।
स्पीच और ऑक्यूपेशनल थेरेपी टीम ने बच्चे की बोलने और सामान्य गतिविधियां करने की क्षमता वापस लाने में सहयोग दिया।
सरकारी अस्पताल बना परिवार की सबसे बड़ी उम्मीद
बच्चे के पिता सिलाई का काम करके परिवार चलाते हैं। सीमित आय होने के कारण लंबे समय तक महंगे निजी अस्पताल में इलाज कराना उनके लिए संभव नहीं था। ऐसे में सरकारी अस्पताल में मुफ्त आईसीयू, वेंटिलेटर और अन्य सुविधाएं मिलने से परिवार को बड़ी राहत मिली। डॉक्टरों का कहना है कि यदि समय पर सही इलाज न मिलता तो बच्चे की जान बचाना बेहद मुश्किल हो सकता था।
122 दिन बाद मिली नई जिंदगी
करीब चार महीने तक चले इलाज, लगातार फिजियोथेरेपी और डॉक्टरों की मेहनत के बाद बच्चा धीरे-धीरे ठीक होने लगा। अब वह अपने पैरों पर चल सकता है, सामान्य रूप से बोल सकता है और अपने परिवार के साथ घर लौट चुका है।
डॉक्टरों ने दिया महत्वपूर्ण संदेश
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति में अचानक हाथ-पैरों में कमजोरी, चलने में परेशानी या सांस लेने में दिक्कत जैसी समस्या दिखाई दे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर अस्पताल पहुंचने और सही इलाज मिलने से गंभीर से गंभीर मरीज की भी जान बचाई जा सकती है। यह मामला आधुनिक चिकित्सा, डॉक्टरों की टीमवर्क और परिवार के धैर्य का एक प्रेरणादायक उदाहरण माना जा रहा है।
