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DMK’s Kanimozhi Joins Modi-Shah Tea Party: मोदी-शाह संग चाय पार्टी में सिर्फ कनिमोझी की एंट्री, राहुल-अखिलेश गायब! क्या DMK बदलने वाली है सियासी पाला?
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1 घंटा agoon

DMK’s Kanimozhi Joins Modi-Shah Tea Party: संसद के मॉनसून सत्र (Monsoon Session) के अंतिम दिन लोकसभा की कार्यवाही मात्र कुछ मिनट ही चल सकी। विपक्ष के हंगामे और नारेबाजी के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने वंदे मातरम् (Vande Mataram) का गान कराया और इसके बाद सदन की कार्यवाही को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया।
हालांकि, सत्र खत्म होने के बाद हुई एक पारंपरिक चाय पार्टी (Tea Party) ने सियासी गलियारों में नई चर्चा को जन्म दे दिया। पीएम नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) के साथ सत्ता पक्ष के कई नेता लोकसभा अध्यक्ष की चाय पार्टी में पहुंचे, लेकिन विपक्ष की ओर से केवल द्रमुक (DMK) सांसद एमके कनिमोझी नजर आईं।
वहीं, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव सहित विपक्ष के दूसरे नेता इस आयोजन से दूर रहे।
DMK’s Kanimozhi Joins Modi-Shah Tea Party: लोकसभा अध्यक्ष की चाय पार्टी में क्या हुआ ?
संसद का सत्र खत्म होने के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने हमेशा की तरह अपने चैंबर में फ्लोर लीडर्स के लिए पारंपरिक चाय पार्टी (Traditional Tea Party) का आयोजन किया। इस आयोजन में सत्तापक्ष की तरफ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पहुंचे।
विपक्षी दलों ने इस बार भी लोकसभा अध्यक्ष की चाय पार्टी का बहिष्कार किया। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, सपा प्रमुख अखिलेश यादव और विपक्ष के अन्य दलों की ओर से कोई प्रमुख नेता वहां नहीं पहुंचा। ऐसे में विपक्षी खेमे से अकेले द्रमुक की एमके कनिमोझी का इस चाय पार्टी में शामिल होना चर्चा का विषय बन गया।
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Modi-Shah के साथ कनिमोझी की मौजूदगी के ‘सियासी’ मायने
एमके कनिमोझी (M.K. Kanimozhi) के चाय पार्टी में पहुंचने को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि पिछले साल मॉनसून सत्र खत्म होने के बाद जब विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष की पारंपरिक चाय पार्टी का बहिष्कार किया था, तब द्रमुक भी विपक्ष के साथ खड़ी थी। उस समय द्रमुक का कोई नेता इस आयोजन में शामिल नहीं हुआ था।
लेकिन इस बार तस्वीर अलग दिखाई दी। विपक्ष के सामूहिक बहिष्कार के बावजूद कनिमोझी चाय पार्टी में पहुंचीं। इसी कारण से राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या द्रमुक (DMK) विपक्षी खेमे से कुछ दूरी बनाकर सत्ता पक्ष के साथ अपने राजनीतिक समीकरण मजबूत करने का पूरा प्रयास कर रही है।
परिसीमन विधेयक पर द्रमुक क्यों है महत्वपूर्ण ?
कनिमोझी की मौजूदगी को सबसे अधिक परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) से जोड़कर देखा जा रहा है। मोदी सरकार के लिए परिसीमन से जुड़ा विधेयक बेहद अहम है और इसे पारित कराने के लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता होगी।
द्रमुक के पास लोकसभा में 22 सांसद (Lok Sabha MPs) हैं। ऐसे में उसका समर्थन सरकार के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण अहम हो सकता है। जानकारी के अनुसार, द्रमुक के विरोध के चलते सरकार अप्रैल में हुए विशेष सत्र में भी इस विधेयक को पारित नहीं करा सकी थी।
मॉनसून सत्र शुरू होने से पहले मोदी सरकार ने द्रमुक नेतृत्व से संपर्क कर परिसीमन के मुद्दे पर समर्थन मांगा था। हालांकि, विपक्ष के निरंतर हंगामे के कारण सरकार इस सत्र में भी विधेयक पेश नहीं कर सकी।
क्या कांग्रेस से भी द्रमुक की बढ़ रही दूरी ?
द्रमुक और कांग्रेस (Congress) के बीच भी रिश्तों में दूरी की चर्चा निरंतर होती रही है। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद द्रमुक सत्ता से बाहर है और कांग्रेस के साथ उसके संबंधों में भी खटास की बात सामने आई है।
थलपति विजय की पार्टी टीवीके (TVK) के साथ कांग्रेस के हाथ मिलाने के बाद द्रमुक ने संसद में कांग्रेस से अलग बैठने की मांग की थी। इसके बाद से द्रमुक ने कांग्रेस से दूरी बनाए रखी है। ऐसे में अब लोकसभा अध्यक्ष की चाय पार्टी में कनिमोझी की मौजूदगी को विपक्ष के अंदर तेजी से बदलते समीकरण के तौर पर देखा जा रहा है।
हालांकि, केवल एक चाय पार्टी में शामिल होने के आधार पर द्रमुक के राजनीतिक रुख में बड़े परिवर्तन का निष्कर्ष निकालना थोड़ी जल्दबाजी होगी, लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि मौजूदा परिस्थितियों में इसकी राजनीतिक अहमियत अवश्य बढ़ गई है।
दो-तिहाई बहुमत का गणित क्या कहता है ?
परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) को संविधान संशोधन के माध्यम से पारित कराने के लिए सरकार को संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। अप्रैल में हुए विशेष सत्र के दौरान मौजूद 528 सदस्यों में से 298 सांसदों ने विधेयक के पक्ष में और 230 ने इसके खिलाफ मतदान किया था। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और द्रमुक ने उस वक़्त विधेयक का विरोध किया था।
फिलहाल भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए (NDA) के पास लोकसभा में 293 सदस्य हैं। तृणमूल कांग्रेस के 20 और शिवसेना यूबीटी के 6 सांसदों को साथ जोड़ने पर यह संख्या 319 हो जाती है। शरद पवार की पार्टी के 8 सांसदों को जोड़ने पर आंकड़ा 327 तक पहुंचता है।
इसके अलावा अप्रैल में NDA के अलावा 5 लोकसभा सांसदों ने सरकार के समर्थन में मतदान किया था। उन्हें भी जोड़ने पर सरकार के पक्ष में संभावित संख्या 332 तक पहुंचती है।
सरकार को अभी भी चाहिए 28 सांसदों का समर्थन
लोकसभा में कुल 543 सांसद हैं और दो-तिहाई बहुमत के लिए 360 सांसदों का समर्थन अवश्य माना जा रहा है। इस गणित के अनुसार, सरकार को अभी 28 और सांसदों के समर्थन की आवश्यकता है।
यही कारण है कि द्रमुक के 22 सांसदों की भूमिका अहम हो जाती है। यदि सरकार को द्रमुक का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थन हासिल होता है तो परिसीमन और महिला आरक्षण विधेयक (Women Reservation Bill) जैसे अहम मुद्दों पर सरकार के लिए संख्या इकठ्ठा करना सरल हो सकता है।
चाय पार्टी से निकले नए सियासी संकेत
संसद का मॉनसून सत्र भले ही हंगामे और विपक्ष-सरकार के टकराव के बीच खत्म हुआ हो, लेकिन आखिरी दिन लोकसभा अध्यक्ष की चाय पार्टी ने एक अलग राजनीतिक संदेश जरूर दिया। जहां राहुल गांधी और अखिलेश यादव समेत विपक्षी नेता इस आयोजन में नहीं पहुंचे, वहीं द्रमुक की एमके कनिमोझी की मौजूदगी ने राजनीतिक चर्चाओं को हवा दे दी।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह केवल एक औपचारिक मुलाकात थी या आगामी दिनों में द्रमुक और केंद्र सरकार के बीच किसी नए राजनीतिक समीकरण की शुरुआत हो सकती है। विशेषकर परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) को लेकर सरकार को जिस संख्या की आवश्यकता है, उसमें द्रमुक के 22 सांसद बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
ऐसे में मोदी-शाह के साथ कनिमोझी की चाय पार्टी में मौजूदगी को लेकर सियासी अटकलें आगे भी जारी रहने की संभावना है।
