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france protests: फ्रांस में आगजनी-बवाल, हिंसक प्रदर्शन में 1200 लोग गिरफ्तार; 143 साल पुराना सिटी हॉल फूंक डाला
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2 घंटे agoon

france protests: पेरिस जल रहा है. फ्रांस की राजधानी में कहीं गाड़ियां जलाई गईं, कहीं दुकानें लूटी गईं और कहीं सरकारी इमारतों को आग के हवाले कर दिया गया. यहां तक कि Limoges शहर के करीब 143 साल पुराने सिटी हॉल Hôtel de Ville की इमारत में ऐसी आग लग गई कि छत का एक हिस्सा ढह गया. हालात इतने बिगड़े कि पुलिस को आंसू गैस और वॉटर कैनन तक का इस्तेमाल करना पड़ा.
‘सिटी ऑफ लव’ अब ‘सिटी ऑफ वायलेंस’ जैसी नजर आ रही है. इस हिंसा को लेकर फ्रांस सरकार ने बड़ा आंकड़ा जारी किया है. प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू के मुताबिक, शनिवार को हुए प्रदर्शनों के दौरान 1200 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया, जबकि हिंसा में 150 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं.
france protests: फ्रांस में इतना बड़ा प्रदर्शन शुरू क्यों?
फ्रांस में प्रोटेस्ट की शुरुआत स्कूलों की खराब होती स्थिति को लेकर छात्रों के प्रदर्शन से हुई. फ्रांस के सेकेंडरी स्कूल यानी lycées, जहां आम तौर पर 15 से 18 साल के छात्र पढ़ते हैं, वहां टीचर्स की कमी और खराब इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर पिछले कई हफ्तों से प्रदर्शन हो रहे थे.
सरकार पर आरोप लगा कि वो स्कूलों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं ले रही. हालात को संभालने की कोशिश में फ्रांस के शिक्षा मंत्री Édouard Geffray ने 8 अक्टूबर को 3 हजार एडिशनल टीचर्स देने का ऐलान किया था. लेकिन इसके बावजूद प्रदर्शन थमे नहीं. धीरे-धीरे इस आंदोलन में छात्रों के साथ ट्रेड यूनियंस, वर्कर्स और दूसरे ग्रुप्स भी जुड़ गए. फिर इसमें Yellow Vest Movement यानी Gilets Jaunes के समर्थक भी शामिल हो गए.
Yellow Vest आंदोलन की शुरुआत 2018 में बढ़ती फ्यूल की कीमतें और ऊंची कॉस्ट ऑफ लिविंग को लेकर हुई थी. अब एक बार फिर वही गुस्सा सड़कों पर दिखाई दे रहा है. लेकिन इस बार मुद्दा सिर्फ स्कूल तक सीमित नहीं है. महंगाई, फ्यूल की कीमतें, ग्रॉसरी की बढ़ती कीमतें, पर्चेजिंग पावर में गिरावट और पब्लिक सर्विस की खराब स्थिति. इन सभी ने सरकार के खिलाफ गुस्सा बढ़ाया है.
प्रदर्शन हिंसक हो गया
17 अक्टूबर को कई जगहों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन हिंसक हो गया. फ्रांस के गृह मंत्री लॉरेंट नुनेज के मुताबिक, देशभर में 100 से ज्यादा मार्च निकाले गए, जिनमें लगभग साढ़े 5 लाख लोग शामिल हुए. सिर्फ पेरिस में 1 लाख से ज्यादा लोगों के प्रदर्शन में शामिल होने का अनुमान है. हालांकि, प्रदर्शन का समर्थन करने वाले ट्रेड यूनियन CGT ने देशभर में प्रदर्शनकारियों की संख्या करीब 8 लाख बताई.
Place de la République के आसपास हुड और मास्क पहने प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पटाखे, पत्थर और दूसरी चीजें फेंकीं. जवाब में पुलिस ने आंसू गैस और वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया. कई गाड़ियों और साइकिलों में आग लगा दी गई.
डस्टबिन में आग लगा दी गई और एक अखबार का कियोस्क भी जल गया. इसके अलावा, कई दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट हुई. पेरिस में पुलिस की कार्रवाई का असर पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर भी पड़ा. पुलिस के आदेश पर कई अहम मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए.
चुनाव से पहले बड़ा प्रदर्शन
इस पूरे मामले का राजनीतिक असर भी बड़ा है. फ्रांस में अगले साल अप्रैल में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं और प्रेसिडेंट इमैनुएल मैक्रों अगले साल अपना कार्यकाल पूरा करके पद छोड़ेंगे. उन्होंने भी हिंसा की कड़ी निंदा की है.
इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि जिन लोगों ने सरकारी दफ्तरों, दुकानों और सिटी हॉल को नुकसान पहुंचाया या उन्हें लूटा, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखने वालों और हिंसा करने वालों के बीच फर्क करने की बात कही. उन्होंने कहा कि जो लोग अराजकता फैलाते हैं, उन्हें देश में शांति से अपनी बात रखने वाले लोगों को रोकने की इजाजत नहीं दी जा सकती.
प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू का आरोप है कि कुछ ग्रुप इन प्रदर्शनों को अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए एक तरह के ‘वॉर्म-अप’ की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. सरकार का साफ संदेश है. विरोध का अधिकार है, लेकिन आगजनी, लूटपाट और सरकारी इमारतों पर हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
तो फ्रांस में इस वक्त तस्वीर बेहद तनावपूर्ण है. सड़कों पर प्रदर्शनों के बीच हिंसा, आगजनी और लूटपाट ने सरकार के सामने लॉ एंड ऑर्डर की बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है. सवाल यही है कि इस पर फ्रांस सरकार क्या कदम उठाती है. इस बढ़ते गुस्से को बातचीत और पॉलिसी में बदलाव से शांत करेगी, या आने वाले महीनों में ये आंदोलन और बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा करेगा.
