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Women Reservation Bill: महिला आरक्षण पास ना होना BJP की रणनीति? जानिए कैसे संसदीय हार बनी मोदी-शाह के लिए वरदान

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Women Reservation Bill: भारतीय राजनीति में जब भी कोई बड़ा उलटफेर होता है, तो उसके पीछे अक्सर एक गहरी कूटनीति छिपी होती है। शुक्रवार को संसद के गलियारों में जो हुआ, उसने सबको हैरान कर दिया। नरेंद्र मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में पहली बार कोई संविधान संशोधन विधेयक (131वां संशोधन) सदन में गिर गया। 298 सांसदों ने पक्ष में वोट दिया, जबकि 230 ने विरोध में, लेकिन दो-तिहाई बहुमत की कमी ने इस ‘ऐतिहासिक’ बिल को कानून बनने से रोक दिया। (Women Reservation Bill) ऊपर से देखने पर यह सरकार की विधायी हार लग सकती है, लेकिन राजनीति के गलियारों में चर्चा है कि यह प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की एक ‘कैलकुलेटेड कूटनीति’ (Calculated Move) है।

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Women Reservation Bill: हार को ‘चुनावी हथियार’ बनाने की पुरानी कला

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति को समझने वाले जानते हैं कि वे किसी भी नकारात्मक स्थिति को ‘जनभावना’ में बदलने के माहिर खिलाड़ी हैं। बिल के गिरते ही जिस तरह से भाजपा ने विपक्षी दलों पर ‘महिला विरोधी’ होने का ठप्पा लगाया है, वह इस बात का संकेत है कि रणनीति पहले से तैयार थी। (Women Reservation Bill) सूत्रों के मुताबिक, कैबिनेट बैठक में पीएम मोदी ने साफ कहा कि विपक्ष ने यह ‘पाप’ किया है और इसकी सजा उन्हें जनता देगी।

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि अगर बिल पास हो जाता, तो सारा क्रेडिट भाजपा को मिलता। लेकिन बिल के गिर जाने से भाजपा को एक बहुत बड़ा चुनावी मुद्दा मिल गया है। (Women Reservation Bill) अब भाजपा देश के हर गांव, हर गली में यह नैरेटिव ले जा रही है कि “हम तो महिलाओं को हक देना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने अड़ंगा लगा दिया।” यह हार 2029 के चुनावों के लिए भाजपा की सबसे बड़ी ‘जीत’ की नींव साबित हो सकती है।

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अमित शाह की ‘चाणक्य नीति’ और कूटनीतिक जीत

अमित शाह, जिन्हें आधुनिक भारतीय राजनीति का ‘चाणक्य’ कहा जाता है, उनके रहते सरकार का कोई बिल सदन में गिर जाए, यह बात आसानी से गले नहीं उतरती। शाह ने सदन में अपनी स्पीच के दौरान बार-बार विपक्ष को चुनौती दी और कहा कि “देश की करोड़ों महिलाएं आपको देख रही हैं।” जानकारों का कहना है कि यह एक सोची-समझी कूटनीतिक जीत है। (Women Reservation Bill) सरकार ने दिखा दिया कि वह महिलाओं के लिए 816 सीटों वाली विशाल लोकसभा और 33% आरक्षण लाना चाहती थी, जबकि विपक्ष ‘परिसीमन’ और ‘क्षेत्रीय संतुलन’ के बहाने इसे रोकना चाहता था। इस हार के जरिए भाजपा ने विपक्ष को एक ऐसे कोने में धकेल दिया है, जहां उन्हें अपनी सफाई देनी भारी पड़ रही है। राहुल गांधी और सोनिया गांधी की ‘विजय मुस्कान’ को भाजपा ने ‘नारी शक्ति के अपमान’ का प्रतीक बनाकर पेश कर दिया है।

2029 की राह और विपक्ष का चक्रव्यूह

यह बिल मुख्य रूप से 2029 में महिला आरक्षण लागू करने के लिए लाया गया था। अब इस बिल के गिरने से 2029 की चुनावी लड़ाई का ‘पिच’ तैयार हो गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने शनिवार रात अपने संबोधन में जिस भावुकता के साथ महिलाओं से माफी मांगी, वह सीधे मतदाताओं के दिल पर चोट करने वाली थी। (Women Reservation Bill) विपक्ष का तर्क है कि वे आरक्षण के खिलाफ नहीं, बल्कि इसके साथ जुड़ी ‘शर्तों’ के खिलाफ थे, लेकिन चुनावी रैलियों में ‘तकनीकी तर्क’ अक्सर ‘भावनात्मक अपीलों’ के सामने फीके पड़ जाते हैं। भाजपा अब इसे ‘महिलाओं के अधिकारों का गला घोंटने’ की घटना के रूप में प्रचारित करेगी। यह हार सरकार के लिए एक ‘शहादत’ की तरह है, जिसे वे आने वाले विधानसभा चुनावों और 2029 के महामुकाबले में ‘ब्रह्मास्त्र’ की तरह इस्तेमाल करेंगे।

क्या यह ‘अहंकार’ की हार है या ‘अजेय’ बनने की तैयारी?

राजनीति में कोई भी हार तब तक हार नहीं होती जब तक उसका अंतिम परिणाम सामने न आ जाए। मोदी और शाह की जोड़ी ने अब तक कई असंभव दिखने वाले बिल (जैसे धारा 370 और राम मंदिर) पास करवाए हैं। (Women Reservation Bill) ऐसे में इस बिल का गिरना उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि एक ‘स्ट्रेटेजिक रिट्रीट’ (रणनीतिक पीछे हटना) हो सकती है। संसदीय हार को चुनावी जीत में बदलने का यह अंदाज़ ही मोदी सरकार को दूसरों से अलग बनाता है। अब देखना यह होगा कि क्या देश की महिलाएं इस ‘संसदीय नाटक’ को विपक्ष का ‘पाप’ मानती हैं या सरकार की ‘विफलता’।

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