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Bengal hung assembly possibility: ना BJP, ना दीदी ये बनेंगे किंगमेकर! Exit Poll में फंसा 148 का आंकड़ा, बंगाल में होगा सदी का सबसे बड़ा उलटफेर?
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37 मिनट agoon

Bengal hung assembly possibility: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों की घड़ी जैसे-जैसे करीब आ रही है, पूरे देश की धड़कनें तेज होती जा रही हैं। 4 मई का सूरज बंगाल के लिए सत्ता का नया सवेरा लाएगा या पुरानी ही इबारत दोहराई जाएगी, इसका फैसला तो मशीनों में बंद है, लेकिन एग्जिट पोल्स ने जो तस्वीर पेश की है, उसने सियासी हलकों में खलबली मचा दी है। (Bengal hung assembly possibility) इस बार मुकाबला किसी एकतरफा लहर का नहीं, बल्कि ‘कांटे की टक्कर’ का है। 294 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत का जादुई आंकड़ा 148 है, और लगभग सभी प्रमुख एग्जिट पोल्स इसी आंकड़े के इर्द-गिर्द सिमटे हुए हैं। हालत ऐसी है कि महज 5 से 10 सीटों का हेर-फेर बंगाल की सत्ता का ताज बदल सकता है।
Bengal hung assembly possibility: Exit Polls का गणित: कांटे पर टिकी है TMC-BJP की किस्मत
ज्यादातर एग्जिट पोल्स इस बार बंगाल में एक ‘द्विध्रुवीय’ यानी दोतरफा मुकाबले की गवाही दे रहे हैं। एबीपी-मैट्रीज सर्वे के आंकड़ों को देखें तो बीजेपी को 146 से 161 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है, जबकि सत्ताधारी टीएमसी को 125 से 140 सीटों के बीच दिखाया गया है। (Bengal hung assembly possibility) यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि अगर बीजेपी अपने निचले स्तर यानी 146 पर रुकती है, तो वह बहुमत से दो कदम दूर रह जाएगी। वहीं PMARQ के सर्वे में बीजेपी को 150 से 175 और टीएमसी को 118 से 138 सीटें दी गई हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि बीजेपी को मामूली बढ़त तो मिल रही है, लेकिन टीएमसी इतनी भी पीछे नहीं है कि उसे कमतर आंका जाए। बंगाल का जनादेश इस बार कांच की तरह नाजुक नजर आ रहा है।
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खामोश वोटर और एक्सिस माई इंडिया का सस्पेंस
इस चुनाव में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब एक्सिस माई इंडिया जैसे दिग्गज पोलस्टर ने बंगाल के आंकड़े जारी करने से ही इनकार कर दिया। इसकी वजह बताई गई ‘मतदाताओं की चुप्पी’। बंगाल में बड़ी संख्या में मतदाताओं ने यह बताने से परहेज किया कि उन्होंने किसे वोट दिया है। (Bengal hung assembly possibility) जानकारों का मानना है कि यह ‘साइलेंट वोटर’ किसी भी पार्टी का गेम बिगाड़ या बना सकता है। पीपुल्स पल्स जैसे सर्वे में तो दोनों पार्टियों के आंकड़े इतने ज्यादा ओवरलैप (एक-दूसरे के ऊपर) कर रहे हैं कि किसी भी पार्टी की जीत संभव है। ऐसे में ‘हंग असेंबली’ यानी त्रिशंकु विधानसभा की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
अगर बनी ‘त्रिशंकु विधानसभा’, तो शुरू होगा असली राजनीतिक खेल
यदि 4 मई को किसी भी दल को 148 सीटों का स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो बंगाल में असल ‘खेला’ शुरू होगा। ऐसी स्थिति में राज्यपाल की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाएगी। आमतौर पर सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने का पहला न्योता दिया जाता है। (Bengal hung assembly possibility) अगर बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरती है लेकिन बहुमत से दूर रहती है, तो उसे निर्दलीय और छोटे दलों के दरवाजे खटखटाने होंगे। वहीं दूसरी ओर, ममता बनर्जी अपनी सत्ता बचाने के लिए कांग्रेस और वाम दलों (लेफ्ट) की ओर हाथ बढ़ा सकती हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी इसके संकेत दे दिए हैं कि वे नतीजों के बाद ही पत्ते खोलेंगे। यह वह मोड़ होगा जहाँ विचारधारा से ज्यादा जोड़-तोड़ की राजनीति हावी रहेगी।
2026 का यह चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक है। राज्य में इस बार 92 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज किया गया, जो लोकतंत्र के प्रति जनता के भारी उत्साह को दर्शाता है। (Bengal hung assembly possibility) लेकिन सवाल यह है कि यह भारी वोटिंग सत्ता के समर्थन में है या बदलाव के लिए? आमतौर पर भारी मतदान को एंटी-इंकम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर) का संकेत माना जाता है, लेकिन बंगाल में ममता बनर्जी का संगठनात्मक ढांचा इतना मजबूत है कि इसे सिर्फ बदलाव की लहर कहना जल्दबाजी होगी। टीएमसी बनाम बीजेपी की इस सीधी जंग में छोटी पार्टियां पूरी तरह हाशिए पर चली गई हैं, जिससे वोटिंग का बिखराव कम हुआ है।
बारीक गणित और राजनीतिक शह-मात का खेल
बंगाल का यह चुनाव अब सिर्फ एक चुनावी मुकाबला नहीं रह गया है, बल्कि यह बेहद बारीक गणित और कूटनीति की परीक्षा बन गया है। अगर बीजेपी 148 का आंकड़ा पार कर लेती है, तो यह बंगाल के इतिहास में एक युग का अंत और नए युग की शुरुआत होगी। (Bengal hung assembly possibility) लेकिन अगर वह 140-145 पर अटकती है, तो ममता बनर्जी एक बार फिर विपक्षी एकजुटता के सहारे बाजी पलट सकती हैं। वाम दल और कांग्रेस, जो विधानसभा में शून्य पर थे, इस बार ‘किंगमेकर’ की भूमिका में नजर आ सकते हैं। (Bengal hung assembly possibility) 4 मई को जब आखिरी मशीन खुलेगी, तभी यह साफ होगा कि ‘बंगाली अस्मिता’ की जीत हुई या ‘परिवर्तन’ के नारे ने कमाल कर दिखाया। तब तक, बंगाल की गलियों से लेकर दिल्ली के दरबार तक, सबकी सांसें थमी हुई हैं।
