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Bengal Mid Day Meal Row: बंगाल में Mid Day Meal पर सियासी घमासान क्यों? ‘अंडे’ पर भिड़े ममता-शुभेंदु

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Bengal Mid Day Meal Row: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों एक अभूतपूर्व और बेहद दिलचस्प नजारा देखने को मिल रहा है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) के मुखिया और उनके बचे हुए साथी भले ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर अपनी पार्टी को जबरन तोड़ने का लगातार संगीन आरोप लगा रहे हों, लेकिन राज्य सरकार के एक ताजा फैसले ने इन दोनों धुर विरोधी गुटों को अचानक एक ही सुर में बोलने के लिए मजबूर कर दिया है. यह पूरा विवाद कोलकाता के सरकारी स्कूलों में मिलने वाले मिड डे मील यानी दोपहर के भोजन में संभावित बदलावों को लेकर शुरू हुआ है. (Bengal Mid Day Meal Row) हालांकि अभी तक सरकारी स्तर पर यह पूरी तरह साफ नहीं किया गया है कि बच्चों की थाली से अंडा हटाया जाएगा या नहीं, क्योंकि प्रशासन की तरफ से कोई भी आधिकारिक पत्र जारी नहीं हुआ है, लेकिन इस पर छिड़ी सियासी जंग ने पूरे सूबे का तापमान बढ़ा दिया है.

Bengal Mid Day Meal Row: चुनावों की वो पुरानी थाली और दावे

हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान ममता बनर्जी और उनके तमाम सिपहसालार जनसभाओं में लगातार यह अंदेशा जता रहे थे कि अगर बंगाल में बीजेपी की सरकार बनी, तो बंगाली समाज के पारंपरिक खान-पान पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी जाएगी. (Bengal Mid Day Meal Row) टीएमसी का दावा था कि बीजेपी सत्ता में आते ही लोगों की थाली की निगरानी शुरू कर देगी और स्कूलों व घरों से मांस, मछली और अंडे गायब हो जाएंगे. उस वक्त तृणमूल के इन तीखे हमलों का जवाब देने के लिए बीजेपी के कई प्रत्याशी अपने हाथों में कच्ची मछली लेकर सड़कों पर घूम-घूमकर वोट मांगते दिखे थे. यहां तक कि बीजेपी के राष्ट्रीय स्तर के कई बड़े नेताओं को भी कैमरे के सामने थाली में मछली खाते हुए दिखाया गया था. लेकिन चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया कि जनता को ममता बनर्जी की उन बातों में कोई दम नहीं लगा और लोगों ने बीजेपी को दिल खोलकर सीटें दीं. नतीजों ने टीएमसी को इस कदर समेट दिया, जैसा साल 2021 के चुनाव में बीजेपी के साथ हुआ था, जब वह 100 सीटों के आंकड़े के अंदर ही सिमट गई थी.

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बिखरने के बाद एक हुए विरोधी सुर

चुनाव परिणाम आने के महज 1 महीने के भीतर ही ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस कोलकाता से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक कई टुकड़ों में बिखर गई. लेकिन जैसे ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली नई बीजेपी सरकार ने मिड डे मील योजना में बदलाव के संकेत दिए, वैसे ही टीएमसी के सभी बिखरे हुए धड़े अचानक एक मंच पर आ गए. (Bengal Mid Day Meal Row) टीएमसी के बागी गुट के बड़े नेता और विधायक ऋतब्रत बनर्जी से लेकर ममता बनर्जी के सबसे खास सिपहसालार कुणाल घोष और राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन तक, सभी इस मुद्दे पर सरकार के खिलाफ एक जैसे तीखे सवाल दाग रहे हैं. पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार बने अभी पूरे 2 महीने भी नहीं बीते हैं, और विपक्ष चिल्लाने लगा है कि ममता बनर्जी ने चुनाव के समय जो भविष्यवाणियां की थीं, उनके जमीनी रुझान अब दिखने शुरू हो गए हैं.

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क्या है बंगाल में अंडे का नया फंडा?

इस पूरे विवाद की जड़ में राज्य सरकार का वह नया फैसला है, जो विधानसभा में बजट पेश करने के दौरान सामने आया था. पश्चिम बंगाल के वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने बजट भाषण में यह बड़ी घोषणा की थी कि सरकार एक शुरुआती योजना (पायलट प्रोजेक्ट) के तहत कोलकाता नगर निगम क्षेत्र के सभी सरकारी स्कूलों में दोपहर के भोजन यानी मिड डे मील के प्रबंधन और उसे पकाने की पूरी जिम्मेदारी इस्कॉन (ISKCON) जैसी बड़ी संस्था को सौंपने जा रही है. इसके साथ ही नई नीति के तहत प्राथमिक विद्यालयों में प्रति छात्र भोजन की सरकारी लागत को 6.78 रुपये से बढ़ाकर सीधे 10 रुपये कर दिया गया है. माना जा रहा है कि कोलकाता के स्कूलों में इस नई व्यवस्था को पूरी तरह जमीन पर उतरने में 1 से 2 महीने का समय लग सकता है, क्योंकि इस्कॉन को इतने बड़े पैमाने पर भोजन तैयार करने के लिए शहर में आधुनिक रसोईघर और अन्य जरूरी संसाधनों का बंदोबस्त करना होगा.

शाकाहारी भोजन पर गहराया सस्पेंस

सरकार की इस आधिकारिक घोषणा के तुरंत बाद से ही पूरे बंगाल में यह डर फैल गया कि जब इस्कॉन जैसी विशुद्ध धार्मिक संस्था बच्चों के लिए भोजन तैयार करेगी, तो वह पूरी तरह से सात्विक और शाकाहारी ही होगा. इसका सीधा मतलब यह निकाला गया कि अब भविष्य में जब बच्चों के सामने खाने की थाली आएगी, तो उसमें से उनका पसंदीदा अंडा पूरी तरह गायब रहेगा. हालांकि इस पूरे विवाद पर इस्कॉन कोलकाता के उपाध्यक्ष राधारमण दास ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है.

उन्होंने मीडिया से कहा कि सोशल मीडिया पर जो तरह-तरह के भोजन के मेन्यू वायरल हो रहे हैं, वे इस्कॉन की तरफ से जारी नहीं किए गए हैं. अभी खाने की सूची को लेकर कोई भी अंतिम फैसला नहीं हुआ है और जब सब कुछ तय हो जाएगा, तो इसकी आधिकारिक घोषणा की जाएगी. इसके बावजूद विपक्ष का गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा है. विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने इस फैसले के खिलाफ कड़ा मोर्चा खोल दिया है, वहीं डेरेक ओ ब्रायन ने तीखा तंज कसते हुए कहा है कि सरकार ने अंडों को सिर्फ विरोधियों पर फेंकने के लिए छोड़ दिया है, जबकि गरीब बच्चों को उनके जरूरी पोषण से दूर किया जा रहा है.

ममता और बागी गुट का साझा हमला

ममता बनर्जी से अलग होकर बागी विधायकों का नेतृत्व कर रहे ऋतब्रत बनर्जी ने सरकार को घेरते हुए कहा कि जब बात बच्चों के शारीरिक विकास और प्रोटीन की हो, तो भोजन की थाली से अंडा हटाना किसी भी लिहाज से सही कदम नहीं ठहराया जा सकता. बंगाल एक ऐसा राज्य है जहां लोग सदियों से अपनी परंपरा के तहत मांसाहारी भोजन को प्राथमिकता देते आए हैं. अगर इसे जबरन बदला गया और सिर्फ शाकाहारी खाना परोसा गया, तो यह बंगाल की मूल संस्कृति पर सीधा प्रहार होगा. उन्होंने कहा कि बंगाल की 5000 साल पुरानी समृद्ध परंपरा रही है कि यहां के बच्चों के खान-पान में जीव जनित प्रोटीन (एनिमल प्रोटीन) शामिल रहता है. अगर इस्कॉन अपने नियमों के मुताबिक खाना बनाएगा, तो केवल अंडा ही बंद नहीं होगा, बल्कि बंगाली घरों में खाई जाने वाली मसूर की दाल भी पूरी तरह प्रतिबंधित हो जाएगी, क्योंकि सात्विक भोजन में उसे भी वर्जित माना जाता है.

कुणाल घोष और डेरेक ओ ब्रायन के कड़े तेवर

दूसरी तरफ, ममता बनर्जी गुट के मुख्य प्रवक्ता और विधायक कुणाल घोष ने भी सरकार की नीयत पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि वर्तमान में बच्चों को स्कूलों में नियमित रूप से अंडे दिए जा रहे हैं, जिससे गरीब परिवारों के बच्चों को ताकत मिलती है. लेकिन अब सरकार के बयानों से साफ संकेत मिल रहे हैं कि वे इसे बंद करने वाले हैं. इस्कॉन निसंदेह एक अत्यंत सम्मानित और पूजनीय संस्था है, लेकिन लाखों गरीब बच्चों को उनकी पसंद और पोषण के मुताबिक रोज भोजन कराना एक अलग और बहुत बड़ी चुनौती है.

वहीं टीएमसी के वरिष्ठ सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बेहद आक्रामक लहजे में लिखा कि चुनाव प्रचार के दौरान बंगाल की गलियों में मछली खाने का जो सियासी तमाशा बीजेपी नेताओं ने किया था, उसकी नौटंकी अब खत्म हो चुकी है और गुजरात जिमखाना का असली चेहरा सबके सामने आ गया है. नई बीजेपी सरकार आते ही बच्चों पर शाकाहार थोपने की जिद पर अड़ गई है, जिसे बंगाल के लोग कभी स्वीकार नहीं करेंगे.

फैसले के बचाव में उतरी बीजेपी सरकार

विपक्ष के इन चौतरफा और तीखे हमलों के बीच मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार भी पूरी तरह से अपने फैसले के बचाव में डट गई है. कैबिनेट मंत्री इंद्रनील खान ने विपक्ष के आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कहा कि इस्कॉन की आधुनिक रसोइयों में जो भी भोजन तैयार किया जाएगा, वह बड़े-बड़े डॉक्टरों और डाइटीशियन की सीधी देखरेख में बनेगा. बच्चों की सेहत के साथ कोई समझौता नहीं होगा और खाने में प्रोटीन व विटामिन की मात्रा का पूरा वैज्ञानिक ध्यान रखा जाएगा. वहीं राज्य के स्कूली शिक्षा मंत्री दीपक बर्मन ने तर्क दिया कि हमारे देश और पूरी दुनिया में करोड़ों ऐसे लोग हैं जो जीवन भर केवल शाकाहारी भोजन खाकर भी बेहद तंदुरुस्त और दीर्घायु रहते हैं. शाकाहारी भोजन में वह तमाम पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में मौजूद होते हैं जो किसी भी बच्चे के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए जरूरी हैं. इसलिए यह कहना बिल्कुल गलत है कि बच्चों को ताकत देने के लिए सिर्फ अंडा ही एकमात्र जरिया है.

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की दो टूक

स्वयं मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा के भीतर इस पूरे मुद्दे पर अपनी सरकार का पक्ष बेहद मजबूती से रखा. उन्होंने विपक्ष के शोर-शराबे के बीच दो टूक शब्दों में कहा कि हमने बच्चों को बेहतर और साफ-सुथरा खाना देने के लिए ही मिड डे मील का जिम्मा इस्कॉन को सौंपने का साहसिक फैसला किया है. अगर किसी को इस पवित्र संस्था से कोई आपत्ति है, तो वह ‘हरे कृष्ण’ मत बोले, सरकार किसी पर कोई दबाव नहीं डाल रही है. लेकिन बच्चों को मिलने वाले भोजन की शुद्धता और उसकी उच्च गुणवत्ता को लेकर किसी को भी चिंता करने की रत्ती भर जरूरत नहीं है.

इस्कॉन ने दिया बंगाली थाली का भरोसा

इस पूरे विवाद के बीच इस्कॉन के पदाधिकारी राधारमण दास ने बताया कि उनकी संस्था वर्तमान में भारत के 8 अलग-अलग राज्यों के 20 से अधिक प्रमुख शहरों में लगभग 12 लाख से ज्यादा स्कूली छात्रों को हर दिन पूरी शुद्धता के साथ मिड डे मील परोस रही है. उन्होंने एक विशेष बातचीत में कहा कि हम पिछले 20-22 साल से पूरे देश में इस सेवा कार्य को बिना किसी शिकायत के चला रहे हैं और करोड़ों लोग हमारे भोजन के स्वाद की तारीफ करते हैं.

बच्चों में कुपोषण की आशंकाओं को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों की पसंद को ध्यान में रखकर विशेषज्ञों के जरिए अभी मेन्यू तैयार किया जाना बाकी है. उन्होंने याद दिलाया कि चैतन्य महाप्रभु खुद एक महान बंगाली थे और इस्कॉन उसी गौड़ीय परंपरा का पूरी निष्ठा से पालन करता है. हम पूरी दुनिया में गौरव के साथ बंगाली थाली परोसते हैं. यह सोचना पूरी तरह भ्रामक है कि बंगाली खाना केवल अंडे या मांस से ही मुकम्मल होता है. हमारे मेन्यू में चावल, दाल, शुद्ध घी की खिचड़ी और ताजी सब्जियां होंगी. प्रोटीन की कमी को पूरा करने के लिए हम भोजन में सोया-चंक्स और राजमा जैसी बेहद पौष्टिक चीजों का इस्तेमाल करेंगे, जो शरीर के लिए बहुत फायदेमंद हैं.

सरकारी शिक्षकों की बढ़ गई है धुकधुकी

भले ही नेताओं की राजनीति अपनी जगह चमक रही हो और इस्कॉन का आश्वासन भी अपनी जगह सही हो, लेकिन जमीन पर काम करने वाले सरकारी स्कूल के शिक्षकों की धुकधुकी काफी बढ़ गई है. कोलकाता के कई प्राथमिक शिक्षकों को यह डर सता रहा है कि अगर हफ्ते में मिलने वाला अंडा बंद हो गया, तो कहीं बच्चे स्कूल आना ही न छोड़ दें. शिक्षकों का कहना है कि मिड डे मील योजना का मुख्य उद्देश्य ही गरीब बच्चों को किताबों और स्कूल की तरफ आकर्षित करना था. नेताजी सुभाष प्राइमरी स्कूल के प्रधानाध्यापक देबब्रत पंती ने बताया कि उनके स्कूल में बच्चों के बीच अंडा सबसे ज्यादा लोकप्रिय है. चूंकि यह एक प्राइमरी स्कूल है, इसलिए यहाँ कभी मछली नहीं परोसी गई, लेकिन हफ्ते में जिस दिन भी बच्चों को अंडा दिया जाता है, उस दिन क्लास में बच्चों की उपस्थिति सामान्य दिनों के मुकाबले हमेशा बहुत ज्यादा दर्ज की जाती है.

खान-पान की आदतें बदलने का डर

एक अन्य अनुभवी शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर अपनी चिंता साझा करते हुए कहा कि बच्चों पर अचानक नया मेन्यू लागू करना उनके ऊपर जबरन स्वाद थोपने जैसा होगा. बंगाल के ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के बहुत से बच्चे पनीर, छोले या राजमा जैसी चीजों से बिल्कुल वाकिफ नहीं हैं, क्योंकि यह उनके गरीब परिवारों की रोजमर्रा की फूड कल्चर का हिस्सा नहीं रहा है. विशेष रूप से जिन सरकारी स्कूलों में अल्पसंख्यक समुदाय या बेहद गरीब तबके के बच्चों की संख्या ज्यादा है, वहां आने वाले दिनों में अभिभावकों की तरफ से तीखा विरोध देखने को मिल सकता है. सरकार को बच्चों को शाकाहार और मांसाहार के बीच कम से कम एक विकल्प चुनने की आजादी जरूर देनी चाहिए थी.

महिला रसोइयों के रोजगार पर संकट

शिक्षकों का यह भी मानना है कि मिड डे मील के इस नए कंप्यूटरीकृत और संस्थागत ढांचे के लागू होने से स्कूलों में सालों से खाना पकाने वाली स्थानीय गरीब महिला रसोइयों की आजीविका पर बहुत बुरा असर पड़ेगा. इन महिलाओं को सरकार की तरफ से करीब 2,000 रुपये प्रति महीना मानदेय मिलता है, जिससे उनका छोटा-मोटा खर्च चलता था. एक शिक्षक ने दुखी मन से बताया कि उनके स्कूल की रसोई में 3 गरीब महिलाएं सालों से यह काम करके अपना घर चला रही थीं, लेकिन अब इस्कॉन के आने से उनका यह छोटा सा रोजगार भी पूरी तरह छिन जाएगा. अब देखना होगा कि 2027 के चुनावों की जमीन तैयार कर रही बीजेपी इस जमीनी विरोध से कैसे निपटती है.

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