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Bihar Politics: बिहार का ‘सम्राट’ कोई और! दिल्ली दरबार में ‘उत्तराधिकारी खोज’, BJP भी ‘सरप्राइज पैकेज’ के साथ तैयार
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7 घंटे agoon

Bihar Politics: बिहार की राजनीति इन दिनों किसी टीवी सीरियल से कम नहीं, बस फर्क इतना है कि यहां स्क्रिप्ट रोज बदलती है और क्लाइमेक्स कभी तय नहीं होता। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के संभावित इस्तीफे और राज्यसभा की ओर उनके कदमों ने सत्ता के गलियारों में ऐसी हलचल मचा दी है, मानो कुर्सी खुद तय नहीं कर पा रही कि अगला मालिक कौन होगा।
Bihar Politics: दिल्ली में ‘मंथन’ या ‘मुकुट चयन’?
9 अप्रैल को दिल्ली में जदयू की हाई-लेवल बैठक बुलाई गई है। आधिकारिक भाषा में इसे संगठनात्मक समीक्षा कहा जा रहा है लेकिन अंदरखाने इसे उत्तराधिकारी चयन समिति का नाम दिया जा चुका है। (Bihar Politics) बैठक में संजय झा, ललन सिंह जैसे दिग्गज शामिल होंगे और खुद नीतीश कुमार इसकी कमान संभालेंगे यानी फैसला वही करेंगे लेकिन दिखेगा कि सबने मिलकर किया।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह बैठक चर्चा से ज्यादा निर्णय के लिए है ताकि जब इस्तीफे की पटकथा सामने आए, तो दर्शकों को झटका न लगे, बस तालियां बजाने का विकल्प बचे।
इस्तीफे से पहले ‘सेटिंग’ जरूरी
नीतीश कुमार की राजनीति का सबसे बड़ा गुण यही रहा है कि वे कभी भी अचानक कुछ नहीं करते हर अचानक के पीछे लंबी तैयारी होती है। (Bihar Politics) इस बार भी संकेत साफ हैं कि मुख्यमंत्री पद छोड़ने से पहले वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि कुर्सी ऐसे हाथों में जाए, जहां से वापस लौटना संभव रहे… या कम से कम प्रभाव बना रहे।
निशांत कुमार का नाम भी चर्चा में है लेकिन जदयू ने फिलहाल परिवारवाद से दूरी का नैतिक चश्मा पहन रखा है हालांकि यह चश्मा कब उतर जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं।
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भाजपा का ‘सरप्राइज़ फैक्टर’
अगर आपको लगता है कि अगला मुख्यमंत्री तय करना आसान है, तो आप भाजपा की राजनीति को कम समझ रहे हैं। पार्टी का ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि जहां सबको A दिखता है, वहां पार्टी अक्सर Z निकाल देती है।
याद कीजिए शिवराज सिंह चौहान को चुनाव जिताने के बाद भी ‘मामा’ को दिल्ली बुला लिया गया और मोहन यादव को मुख्यमंत्री बना दिया गया। (Bihar Politics) हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर और झारखंड में रघुवर दास दोनों ही ऐसे नाम थे, जिन पर पहले चर्चा कम और फैसला ज्यादा हुआ।
दिल्ली में भी यही फार्मूला रेखा गुप्ता का नाम अचानक उछाल कर सबको चौंका दिया गया। यानी भाजपा की राजनीति अब सरप्राइज ही स्ट्रैटेजी है के सिद्धांत पर चलती दिखती है।
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बिहार में डिप्टी सीएम का ‘शाप’
बिहार की राजनीति का एक दिलचस्प ‘अंधविश्वास’ भी इस वक्त चर्चा में है, यहां डिप्टी सीएम कभी सीएम नहीं बनता। सुशील कुमार मोदी सालों तक डिप्टी रहे लेकिन कुर्सी उनसे दूर ही रही। (Bihar Politics) तेजस्वी यादव भी दो बार इस पद तक पहुंचे लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी अब तक आकांक्षा ही बनी हुई है।
अब मौजूदा समीकरण में दो डिप्टी सीएम हैं सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा। चर्चा में सम्राट चौधरी आगे बताए जा रहे हैं लेकिन भाजपा की आदत को देखते हुए यह बढ़त उतनी ही भरोसेमंद है, जितनी मौसम विभाग की हल्की बारिश की भविष्यवाणी।
भाजपा की ओर से जिन नामों की चर्चा है, उनमें नित्यानंद राय भी शामिल हैं। वहीं सोशल मीडिया ने अपना अलग ही उम्मीदवार पेश कर दिया है। (Bihar Politics) अभय गिरि जिसके बारे में आधी जानकारी अफवाह है और आधी कल्पना। लेकिन राजनीति में कल्पना ही कई बार वास्तविकता बन जाती है खासकर तब, जब पार्टी का डीएनए चौंकाने पर टिका हो।
कुर्सी वही, खेल नया
इतना तय है कि नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के साथ बिहार की सत्ता का संतुलन बदल जाएगा और एनडीए में भाजपा की भूमिका और मजबूत होगी। (Bihar Politics) जदयू किंगमेकर से संतुलनकर्ता की भूमिका में आ सकती है। दिल्ली की बैठक असल में बिहार की राजनीति का अगला अध्याय लिखेगी जहां सवाल सिर्फ यह नहीं है कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा बल्कि यह भी है कि असली सत्ता किसके पास रहेगी। और बिहार की राजनीति को जानने वाले एक बात अच्छे से जानते हैं यहां कुर्सी पर बैठने वाला चेहरा बदल सकता है लेकिन कुर्सी चलाने वाला दिमाग अक्सर वही रहता है।

