राष्ट्रीय समाचार
BJP-SAD Alliance: BJP-SAD गठबंधन में UCC बना रोड़ा! सुखबीर बादल के सामने बड़ा धर्मसंकट…पंजाब में नए सियासी संकेत
Published
1 महीना agoon

BJP-SAD Alliance: अगले साल होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राज्य के राजनीतिक गलियारों में एक नया और बेहद दिलचस्प तूफान आ खड़ा हुआ है। एक तरफ जहां सालों पुरानी अपनी पुरानी सहयोगी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के साथ फिर से गठबंधन की खिचड़ी पकाई जा रही है, वहीं दूसरी तरफ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के एक ताजा बयान ने शिरोमणि अकाली दल (SAD) के सामने एक नई धर्मसंकट की स्थिति पैदा कर दी है। अमित शाह ने स्पष्ट कर दिया है कि साल 2029 से पहले देश के सभी 21 एनडीए शासित राज्यों में समान नागरिक संहिता (UCC) को लागू कर दिया जाएगा। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जिस यूसीसी का अकाली दल हमेशा से खुलकर विरोध करता आया है, क्या गठबंधन के खातिर वह अब इस मुद्दे पर अपनी पुरानी कड़क लाइन को पूरी तरह भूल जाएगा?
BJP-SAD Alliance: अमित शाह के इस ऐलान ने बढ़ाई सहयोगियों की धड़कन
दरअसल, रविवार को मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने सीधे शब्दों में केंद्र की मंशा साफ कर दी। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार तीन तलाक जैसी प्रथा को पहले ही खत्म कर चुकी है और कई राज्यों में समान नागरिक संहिता को सफलता के साथ लाया गया है। अमित शाह ने दावा किया कि 2029 से पहले देश के सभी 21 एनडीए शासित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इसे हर हाल में लागू कर दिया जाएगा। वर्तमान में एनडीए देश के 20 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों की सत्ता में काबिज है। अमित शाह के इस बड़े और आक्रामक ऐलान के बाद से ही उन सहयोगी दलों के कान खड़े हो गए हैं, जो अल्पसंख्यक समुदायों या आदिवासियों के बीच अपना मुख्य वोट बैंक रखते हैं।
Also Read –Amitabh Bachchan Retirement: क्या अमिताभ बच्चन लेंगे रिटायरमेंट? कहा-रिटायर होने का समय आ गया
क्या अपनी पुरानी बातें भूल जाएंगे सुखबीर सिंह बादल?
अकाली दल के इतिहास पर नजर डालें तो उसने हमेशा से यूसीसी का पुरजोर विरोध किया है। साल 2023 में जब 22वें विधि आयोग (Law Commission) ने यूसीसी पर राय मांगी थी, तब अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने बाकायदा खत लिखकर इसका विरोध जताया था। उन्होंने लिखा था कि भारत की असली खूबसूरती ‘विविधता में एकता’ है ना कि जबरन एकरूपता थोपने में। बादल का कहना था कि यूसीसी लागू होने से देश के अल्पसंख्यकों, अलग-अलग जातियों और धार्मिक समुदायों की आजादी और अधिकारों पर सीधा असर पड़ेगा। अकाली दल के इस कड़े स्टैंड के कारण ही पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) को भी अपना रुख बदलकर यूसीसी का विरोध करने पर मजबूर होना पड़ा था। लेकिन आज जब अकाली दल खुद बीजेपी से दोबारा हाथ मिलाने को बेताब नजर आ रही है, तो यूसीसी पर उसकी रहस्यमयी चुप्पी कई बड़े सवाल खड़े कर रही है।
अकाली दल की मजबूरी और गठबंधन का नया समीकरण
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पंजाब में अपनी खोई हुई सियासी जमीन को वापस पाने के लिए अकाली दल इस समय बीजेपी से गठबंधन करने के लिए बेहद बेताब है। साल 2022 के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी की आंधी में अकाली दल पूरी तरह साफ हो गई थी और महज एक सीट पर सिमट गई थी। इसके बाद से ही पंजाब में अलगाववादी अमृतपाल सिंह जैसे चेहरों के आने से अकाली दल का पारंपरिक पंथिक वोट बैंक भी खिसक रहा है। हाल ही में सुखबीर सिंह बादल ने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी, जिसके बाद से दोनों दलों के साथ आने की चर्चाएं तेज हो गई हैं। इतना ही नहीं, पंजाब यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में अकाली दल के छात्र संगठन (SOI) ने बीजेपी के छात्र संगठन (ABVP) का खुलकर समर्थन भी किया था, जो दोनों दलों की नजदीकियों का साफ संकेत देता है।
बाकी सहयोगी दलों का रुख और पंजाब का सियासी भविष्य
यूसीसी केवल अकाली दल के लिए ही नहीं, बल्कि एनडीए के कई अन्य क्षेत्रीय सहयोगियों के लिए भी एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। मेघालय की एनपीपी, नागालैंड की एनपीएफ और सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा जैसे दल इसका विरोध करते रहे हैं, जबकि बिहार में जेडीयू और आंध्र प्रदेश में टीडीपी अब इस पर नरमी से विचार करने की बात कह रही हैं। हालांकि पंजाब के मामले में विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य की मुख्य राजनीति यूसीसी से ज्यादा पानी के बंटवारे, चंडीगढ़ पर नियंत्रण और संघीय ढांचे जैसे मुद्दों पर केंद्रित रही है। फिर भी, यदि बीजेपी और अकाली दल का गठबंधन तय होता है, तो यूसीसी का यह जिन्न अकाली दल का पीछा आसानी से नहीं छोड़ेगा और विरोधी दल इस मुद्दे पर अकाली दल को घेरने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देंगे।
