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India Glacier Flood Risk: नेपाल-तिब्बत की बाढ़ ने बढ़ाई भारत की टेंशन, दार्जिलिंग समेत पूरे बंगाल पर क्यों मंडरा रहा खतरा?
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1 दिन agoon

India Glacier Flood Risk: नेपाल-तिब्बत सीमा पर हाल ही में ग्लेशियर टूटने से आई भीषण बाढ़ ने पूरे पूर्वी हिमालयी क्षेत्र में ‘कैस्केडिंग डिजास्टर’ के खतरे को लेकर चिंता बढ़ा दी है। यानी पहाड़ों में एक प्राकृतिक आपदा शुरू होने के बाद उसके कारण दूसरी और फिर तीसरी आपदा पैदा हो सकती है और इसका असर सैकड़ों किलोमीटर दूर तक पहुंच सकता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि भूकंप, बर्फ या चट्टान का भूस्खलन, मूसलाधार बारिश या ग्लेशियर झील का फटना ऐसी विनाशकारी श्रृंखला शुरू कर सकता है, जिसे रोकना बेहद मुश्किल हो सकता है। जिसके बाद भारत के दार्जिलिंग समेत कई इलाकों को लेकर भी चिंता बढ़ गई है।
India Glacier Flood Risk: नेपाल में दिखा कैस्केडिंग डिजास्टर का असर
नेपाल में लहेंडे खोला और भोटेकोशी नदी में मलबे का भारी सैलाब इस खतरे का बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है। शुरुआत में इस घटना को भूकंप माना गया था, लेकिन अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण यानी यूएसजीएस (USGS) ने पुष्टि की कि करीब 1.2 किलोमीटर की ऊंचाई से गिरे बड़े हिमखंड और चट्टानों के प्रभाव से 5.2 तीव्रता के भूकंप जैसी कंपन पैदा हुई थी।
इस घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर हिमालय के ऊपरी हिस्से में किसी प्राकृतिक घटना के बाद दूसरी आपदा शुरू हो जाए तो उसका असर कितनी तेजी से नीचे के इलाकों तक पहुंच सकता है।
दार्जिलिंग पर क्यों मंडरा रहा खतरा?
दरअसल पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में सिक्किम जैसी विशाल और ऊंचाई वाली ग्लेशियर झीलें नहीं हैं। इसके बावजूद दार्जिलिंग उसी नाजुक और भूगर्भीय रूप से अस्थिर हिमालयी तंत्र का हिस्सा है। यही वजह है कि यहां एक आपदा दूसरी आपदा को जन्म दे सकती है।
दार्जिलिंग हाई रिस्क वाले ‘जोन IV’ में आता है। तेज भूकंप के झटके पहाड़ी ढलानों को कमजोर कर सकते हैं। इसके बाद बड़े पैमाने पर मलबा खिसककर नदियों का प्राकृतिक रास्ता रोक सकता है।
बारिश और भूस्खलन पहले से बड़ी चुनौती
दार्जिलिंग और आसपास के पहाड़ी इलाकों में मूसलाधार बारिश और कमजोर पहाड़ियों की वजह से भूस्खलन यानी लैंडस्लाइड (Landslide) लगातार होते रहते हैं।
अक्टूबर 2025 में सिर्फ 12 घंटे के भीतर 300 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश हुई थी। इसके बाद बड़े पैमाने पर भूस्खलन और मलबे का बहाव हुआ था। इस घटना में 24 लोगों की जान चली गई थी।
‘जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल मैनेजमेंट’ (Journal of Environmental Management) की एक स्टडी में भी दार्जिलिंग-सिक्किम उच्चभूमि क्षेत्र को बाढ़ के लिहाज से बेहद संवेदनशील कैटेगरी में रखा गया है।
कैसे शुरू होती है तबाही की पूरी श्रृंखला?
विशेषज्ञों के मुताबिक, हिमालय में सबसे बड़ा खतरा किसी एक प्राकृतिक आपदा से नहीं, बल्कि एक आपदा से दूसरी आपदा पैदा होने से है। पहाड़ी ढलानों से बर्फ या चट्टानों का भारी मलबा नीचे खिसक सकता है। यह मलबा नदी के प्राकृतिक बहाव को रोक सकता है और इसके पीछे पानी जमा होकर एक अस्थायी झील बना सकता है।
जब इस झील में पानी का दबाव बढ़ जाता है तो प्राकृतिक बांध अचानक टूट सकता है। इसके बाद नीचे की तरफ बेहद तेज फ्लैश फ्लड (Flash Flood) आ सकती है।
ग्लेशियर झील टूटने से और बढ़ता खतरा
ऊपरी हिस्से में हिमस्खलन भी ग्लेशियर झील में गिर सकता है। इससे झील में अचानक बहुत बड़ी लहर पैदा हो सकती है। अगर यह लहर इतनी ताकतवर हो कि झील की मोरेन दीवारें टूट जाएं तो पूरा पानी नीचे की तरफ तबाही मचा सकता है। यही कैस्केडिंग डिजास्टर की सबसे खतरनाक स्थिति है, जिसमें एक प्राकृतिक घटना कुछ ही समय में दूसरी बड़ी आपदा को जन्म दे देती है।
बंगाल तक पहुंच सकता है GLOF का असर
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ऊपरी हिमालय में ग्लेशियर झील फटने यानी जीएलओएफ (Glacial Lake Outburst Flood) का सीधा असर नीचे बसे उत्तरी बंगाल के जिलों तक पहुंच सकता है।
अक्टूबर 2023 में उत्तरी सिक्किम की साउथ ल्होनक झील (South Lhonak Lake) फट गई थी। इसके बाद तीस्ता नदी में अचानक बाढ़ आई और कलिम्पोंग के साथ पश्चिम बंगाल के मैदानी इलाकों में भी भारी तबाही हुई थी। इस बाढ़ में पुल और राष्ट्रीय राजमार्ग यानी एनएच-10 (NH-10) तक बह गए थे।
हजारों लोगों पर पड़ सकता है असर
मॉडलों के मुताबिक संभावित जीएलओएफ घटनाओं से बंगाल-सिक्किम सीमा के आसपास 10 हजार से ज्यादा लोग प्रभावित हो सकते हैं। इसके अलावा करीब 1,900 इमारतें, 5 पुल और 2 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट भी सीधे तौर पर प्रभावित होने की आशंका जताई गई है।
इससे साफ है कि हिमालय के ऊपरी हिस्से में होने वाली आपदा का असर सिर्फ पहाड़ी इलाकों तक सीमित नहीं रहता। पानी और मलबे के साथ इसका असर नीचे बसे बड़े इलाकों तक पहुंच सकता है।
2050 तक बढ़ सकता है जोखिम
इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट यानी आईसीआईएमओडी (ICIMOD) के मुताबिक पूर्वी हिमालयी क्षेत्र 2050 तक जीएलओएफ के पीक रिस्क जोन में पहुंच सकता है। इतना ही नहीं, इस सदी के अंत तक पूरे हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में जीएलओएफ का खतरा तीन गुना तक बढ़ सकता है।
कमजोर हो रही पहाड़ों की पकड़
बढ़ता तापमान भी इस खतरे को और गंभीर बना रहा है। तापमान बढ़ने से पर्वतीय परमाफ्रॉस्ट यानी लंबे समय से जमी हुई बर्फ और मिट्टी पिघल रही है।
इससे पहाड़ियों को थामकर रखने वाली प्राकृतिक पकड़ कमजोर हो रही है। ऐसी स्थिति में ढलानों के खिसकने और मलबा नीचे आने का खतरा बढ़ सकता है।
अब बदलनी होगी आपदा प्रबंधन की रणनीति
नेपाल की हालिया घटना ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि आपदा प्रबंधन की पुरानी रणनीति पर्याप्त है या नहीं। विशेषज्ञों के मुताबिक अब भू-विज्ञानियों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों को अलग-अलग आपदाओं के तौर पर तैयारी करने के बजाय पूरे नदी बेसिन को एक इंटीग्रेटेड यूनिट मानकर योजना बनानी होगी।
इसके लिए ग्लेशियर झीलों की रीयल-टाइम मॉनिटरिंग (Real-Time Monitoring) जरूरी है। इसके साथ ही पहाड़ी ढलानों पर अनियंत्रित निर्माण पर रोक, भूकंप-रोधी संरचनाएं और हिमालय की चोटियों से लेकर बंगाल के निचले इलाकों तक मजबूत अर्ली वार्निंग सिस्टम (Early Warning System) तैयार करना जरूरी होगा।
नेपाल-तिब्बत सीमा की घटना ने दिखा दिया है कि हिमालय में एक छोटी दिखने वाली प्राकृतिक घटना भी कई आपदाओं की पूरी श्रृंखला शुरू कर सकती है। ऐसे में दार्जिलिंग, सिक्किम और नीचे के मैदानी इलाकों के लिए समय रहते चेतावनी और तैयारी ही नुकसान को कम करने का सबसे अहम तरीका हो सकता है।
