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MP Seoni Hospital News: सिवनी अस्पताल में 80 नवजातों की मौत कैसे? BJP विधायक ने उठाए गंभीर सवाल
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5 घंटे agoon

MP Seoni Hospital News: मध्य प्रदेश के सिवनी जिला अस्पताल में छह महीने के भीतर 80 नवजात बच्चों की मौत का मामला सामने आने से स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अप्रैल से सितंबर के बीच हुई इन मौतों को लेकर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के विधायक दिनेश राय मुनमुन ने भी जांच की मांग की है। विधायक ने अस्पताल में डॉक्टरों की उपलब्धता, वेंटिलेटर की व्यवस्था और नर्सिंग स्टाफ के प्रशिक्षण पर सवाल उठाए हैं। वहीं, अस्पताल प्रशासन का कहना है कि ज्यादातर बच्चों की मौत समय से पहले जन्म और कम वजन जैसी गंभीर स्थितियों के कारण हुई।
MP Seoni Hospital News: अप्रैल से सितंबर तक 80 नवजातों की मौत
रिपोर्ट के मुताबिक, सिवनी के सरकारी अस्पताल में अप्रैल से जून के बीच 34 नवजातों की मौत हुई, जबकि जुलाई से सितंबर के दौरान 46 बच्चों ने दम तोड़ दिया। यानी दूसरी तिमाही की तुलना में अगले तीन महीनों में मौतों का आंकड़ा बढ़ा।
मामले की जानकारी मिलने के बाद शनिवार को भाजपा विधायक दिनेश राय मुनमुन ने अस्पताल का निरीक्षण किया। विधायक के मुताबिक, अस्पताल पहुंचने पर कर्मचारियों ने शुरुआत में उन्हें परिसर में प्रवेश करने से रोकने की कोशिश की। उन्होंने आरोप लगाया कि निरीक्षण के दौरान कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था और कर्मचारियों ने बताया कि मामले की जांच तथा ऑडिट की प्रक्रिया चल रही है।
आखिर क्यों हुई नवजातों की मौत?
अस्पताल प्रशासन के अनुसार, नवजातों की मौत के पीछे प्रमुख कारण समय से पहले जन्म लेना और जन्म के समय वजन बहुत कम होना है। सिविल सर्जन डॉ. विनोद कुमार नवकार ने बताया कि जिले के ग्रामीण इलाकों से गंभीर हालत में नवजातों को अस्पताल की विशेष नवजात देखभाल इकाई (SNCU) में रेफर किया जाता है।
उन्होंने बताया कि कई बच्चे गर्भावस्था के छह, सात या आठ महीने में ही पैदा हो जाते हैं। ऐसे बच्चों के अंग पूरी तरह विकसित नहीं होते और उन्हें सांस लेने में परेशानी, संक्रमण तथा अन्य गंभीर जटिलताओं का खतरा अधिक रहता है।
डॉ. नवकार के मुताबिक, अस्पताल ने छह महीने में कुल 1,188 नवजातों का इलाज किया। इनमें से आधे से अधिक बच्चों का जन्म के समय वजन कम था। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, जन्म के समय 2.5 किलोग्राम से कम वजन वाले बच्चे को कम जन्म वजन वाला माना जाता है।
अस्पताल प्रशासन का कहना है कि यहां कुछ नवजातों का वजन महज 1,100 ग्राम, 900 ग्राम और यहां तक कि 500 ग्राम तक था। ऐसे बच्चों को बचाने के लिए विशेष निगरानी, सांस लेने में सहायता और प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मियों की जरूरत होती है।
हालांकि, कम वजन और समय से पहले जन्म को मौतों का प्रमुख कारण बताने से यह सवाल खत्म नहीं होता कि अस्पताल में उपलब्ध सुविधाएं पर्याप्त थीं या नहीं। प्रत्येक मौत के वास्तविक कारण का पता लगाने के लिए मेडिकल रिकॉर्ड, इलाज के दौरान उपलब्ध सुविधाओं और मृत्यु ऑडिट की रिपोर्ट की जांच जरूरी है।
BJP विधायक का आरोप- सांस लेने में परेशानी से गईं 46 जानें
विधायक दिनेश राय मुनमुन ने दावा किया कि पिछले तीन महीनों में 46 नवजातों की मौत सांस लेने में परेशानी के कारण हुई। उन्होंने अस्पताल में बच्चों के लिए वेंटिलेटर होने के बावजूद विशेषज्ञ डॉक्टर की उपलब्धता पर सवाल उठाए।
विधायक के अनुसार, सांस लेने में परेशानी से जूझ रहे बच्चों के उपचार के लिए वेंटिलेटर की व्यवस्था है, लेकिन संबंधित डॉक्टर रात में अस्पताल में मौजूद नहीं रहते। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि नर्सों को इस तरह के गंभीर मामलों को संभालने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिला है।
ये विधायक के आरोप हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि और प्रत्येक मौत के कारणों की विस्तृत जानकारी जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
अस्पताल प्रशासन ने क्या कहा?
सिविल सर्जन डॉ. विनोद कुमार नवकार ने बताया कि अस्पताल में आने वाले कई नवजात पहले से ही गंभीर हालत में होते हैं। समय से पहले जन्म और अत्यधिक कम वजन के कारण ऐसे बच्चों को बचाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
उन्होंने यह भी दावा किया कि अस्पताल में नवजात मृत्यु दर जबलपुर संभाग के अन्य जिलों की तुलना में कम है। हालांकि, विधायक ने इस दावे पर सवाल उठाया। उनका कहना है कि गंभीर हालत वाले बच्चों को दूसरे अस्पतालों में रेफर भी किया जाता है, इसलिए केवल अस्पताल में दर्ज मौतों के आंकड़ों से पूरी स्थिति का आकलन नहीं किया जा सकता।
जांच में इन सवालों के जवाब जरूरी
सिवनी अस्पताल में छह महीने में 80 नवजातों की मौत के मामले में अब सबसे अहम सवाल यह है कि कितनी मौतें समय से पहले जन्म और कम वजन जैसी चिकित्सकीय जटिलताओं के कारण हुईं और कितने मामलों में इलाज, डॉक्टरों की अनुपलब्धता या उपकरणों की कमी की भूमिका रही।
जांच में रात की शिफ्ट में डॉक्टरों की मौजूदगी, वेंटिलेटर और अन्य जीवनरक्षक उपकरणों की उपलब्धता, प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ, रेफरल व्यवस्था और प्रत्येक नवजात की मेडिकल हिस्ट्री की पड़ताल जरूरी होगी। साथ ही, जुलाई से सितंबर के बीच मौतों की संख्या बढ़ने के कारणों का भी आकलन किया जाना चाहिए।
फिलहाल, उपलब्ध रिपोर्ट में 80 मौतों के पीछे समय से पहले जन्म और कम जन्म वजन को अस्पताल प्रशासन ने प्रमुख कारण बताया है, जबकि भाजपा विधायक ने सांस संबंधी समस्याओं के इलाज और स्टाफ की उपलब्धता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। मौतों की स्वतंत्र जांच और मेडिकल ऑडिट के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही जिम्मेदारी और वास्तविक कारणों की तस्वीर स्पष्ट होगी।
15 अक्टूबर 2026 तक सामने आई मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, मामले में जांच के बाद कार्रवाई भी की गई है। दैनिक जागरण और नईदुनिया की रिपोर्ट के अनुसार, एसएनसीयू के प्रभारी डॉ. पारस पटेरिया को हटाकर शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. विनोद दहायत को जिम्मेदारी सौंपी गई है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. पंकज दुबे ने जांच दल गठित किया था।
