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Akhilesh Yadav Brahmin Vote Bank: ब्राह्मणों पर क्यों डोरे डाल रहे अखिलेश यादव? क्या सपा के साथ जाएगा BJP का पावरफुल वोट बैंक, 2027 में बदलेगा खेल!
Published
3 सप्ताह agoon

Akhilesh Yadav Brahmin Vote Bank: उत्तर प्रदेश की राजनीति में 10 सालों से सत्ता से बाहर चल रही समाजवादी पार्टी 2027 के विधानसभा चुनावों में किसी भी कीमत पर लखनऊ की गद्दी पर वापसी करना चाहती है। इसके लिए सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव हर संभव राजनीतिक दांव-पेच आजमाने में जुटे हैं। इसी रणनीति के तहत उन्होंने यूपी के सबसे प्रभावशाली वोट बैंक यानी ‘ब्राह्मण समाज’ को अपने पाले में लाने के लिए एक बड़ा दांव खेला है। महान समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र की जयंती के मौके पर लखनऊ में आयोजित एक बड़े कार्यक्रम में अखिलेश यादव ने आगामी चुनाव के लिए अयोध्या सीट से पवन पांडे को उम्मीदवार घोषित कर अपने इरादे साफ कर दिए। यही नहीं, शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के चरणों में बैठकर “समाजवाद ही सनातन है” का नारा देकर उन्होंने अपनी बदली हुई रणनीति का खुलकर प्रदर्शन किया।
Akhilesh Yadav Brahmin Vote Bank: अखिलेश का नया फॉर्मूला
ब्राह्मण समाज को आकर्षित करने के लिए अखिलेश यादव ने अपने सबसे पसंदीदा ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले की परिभाषा ही बदल दी। अखिलेश ने अपने हालिया भाषण में एक नई लाइन जोड़ते हुए कहा कि उनके पीडीए में ‘P’ का मतलब केवल पिछड़ा नहीं, बल्कि ‘पंडित’ भी है। सपा प्रमुख के इस बयान के बाद यूपी के सियासी गलियारों में हलचल मच गई है और सभी राजनीतिक पंडित इसके अलग-अलग मायने निकालने लगे हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि जब तक बीजेपी के मजबूत और पारंपरिक वोट बैंक में सेंध नहीं लगाई जाएगी, तब तक 2027 की सत्ता की राह बेहद मुश्किल रहने वाली है।
BJP के वोट बैंक में सेंधमारी क्यों है ज़रूरी?
अगर यूपी के पिछले चुनावों के आंकड़ों पर नज़र डालें तो 2014 से लेकर अब तक ब्राह्मण समाज का करीब 90 से 95 प्रतिशत वोट बीजेपी या एनडीए गठबंधन को ही मिलता आया है। 2017 के चुनाव में बीजेपी ने 39.67% वोट के साथ 312 सीटें जीती थीं, जबकि सपा को 21.82% वोट और 47 सीटें मिली थीं। वहीं 2022 के चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर बढ़कर 41.29% हो गया, हालांकि उसकी सीटें घटकर 255 रह गईं। दूसरी तरफ, सपा का वोट प्रतिशत बढ़कर 32.06% हुआ और सीटें 111 तक पहुंचीं।
इन आंकड़ों से एक बात बिल्कुल साफ होती है कि 2022 में सपा का वोट बैंक 10 फीसदी ज़रूर बढ़ा, लेकिन वह बढ़त बीएसपी के खिसकते वोट बैंक (जो 22.24% से गिरकर 12.88% पर आ गया) के कारण हुई थी। सत्ताधारी बीजेपी का वोट बैंक कम होने के बजाय करीब दो फीसदी बढ़ ही गया था। ऐसे में अखिलेश समझ चुके हैं कि जब तक बीजेपी के कोर वोट बैंक यानी ब्राह्मणों को अपने पाले में नहीं लाया जाएगा, तब तक उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल करना असंभव है।
अखिलेश को कहां दिख रही है उम्मीद?
दरअसल, राज्य में राजपूत समाज से आने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल के दौरान ब्राह्मण समाज के एक वर्ग में इस बात को लेकर थोड़ी दूरी महसूस की जा रही है कि उन्हें सरकार में पहले जैसा दबदबा नहीं मिला। हालांकि ब्रजेश पाठक जैसे बड़े नेता उपमुख्यमंत्री पद पर हैं, फिर भी अंदरूनी खींचतान की खबरें आती रही हैं। 25 दिसंबर 2025 को लखनऊ में बीजेपी के ब्राह्मण विधायकों की एक अनौपचारिक बैठक के बाद उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने की घटना ने भी समाज में थोड़ी नाराज़गी पैदा की थी। इसके अलावा, प्रयागराज कुंभ के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े विवाद, यूजीसी कानून को लेकर सवर्णों के बीच पनपा असंतोष, अयोध्या राम मंदिर चढ़ावे से जुड़ी खबरें और सवर्ण समाज में आरक्षण की समीक्षा को लेकर चल रही चर्चाओं ने अखिलेश यादव को अपनी पैठ बनाने का एक मौका दे दिया है।
क्या सच में अखिलेश का साथ देगा ब्राह्मण समाज?
भले ही ब्राह्मण समाज के कुछ वर्गों में मौजूदा व्यवस्था को लेकर शिकायतें हों, लेकिन बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या वे वाकई समाजवादी पार्टी के साथ जाने का जोखिम उठाएंगे? जिन मुद्दों पर ब्राह्मण समाज की चिंताएं हैं, उन पर सपा का रुख बीजेपी से काफी अलग है। समाजवादी पार्टी खुद आरक्षण की सीमा को 75 प्रतिशत तक बढ़ाने की वकालत कर रही है। इसके अलावा, यूसीसी कानून जैसे मुद्दों पर भी सपा का रुख ब्राह्मण समाज की अपेक्षाओं से मेल नहीं खाता। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल ‘सनातन’ का नाम लेने और ‘पंडित’ शब्द जोड़ने से ब्राह्मण वोट बैंक का रातों-रात सपा की तरफ पूरी तरह शिफ्ट होना आसान नहीं होगा। फिलहाल, अखिलेश यादव की इस नई रणनीति ने यूपी चुनाव 2027 के माहौल को काफी दिलचस्प ज़रूर बना दिया है।
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