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‘Regime Change: नहीं हो सकता’ पर घमासान, मोहन भागवत के बयान पर प्रियांक खरगे का तीखा हमला
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4 घंटे agoon

‘Regime Change: बेंगलुरु: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के ‘Regime Change’ यानी सत्ता परिवर्तन को लेकर दिए गए बयान पर सियासी घमासान छिड़ गया है। कर्नाटक के मंत्री और कांग्रेस नेता प्रियांक खरगे ने भागवत के बयान पर कटाक्ष करते हुए चुनाव आयोग की निष्पक्षता, मुख्य चुनाव आयुक्त को मिली कानूनी सुरक्षा और RSS की राजनीतिक भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं। खरगे ने संघ को सांस्कृतिक संगठन होने की छवि छोड़कर बाकायदा राजनीतिक संगठन के रूप में सामने आने की चुनौती दी।
खरगे ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त और मतदाता सूची से जुड़ी व्यवस्थाओं पर सत्तारूढ़ पक्ष का प्रभाव है। उन्होंने दावा किया जब उन लोगों ने चुनाव आयोग, चुनाव आयुक्त और Form 6 और Form 7 को कैप्चर कर लिया है, ऐसे में रेजीम चेंज कैसे हो सकता है? उन्होंने सवाल किया कि ऐसी परिस्थितियों में देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की उम्मीद कैसे की जा सकती है। हालांकि, ये खरगे के राजनीतिक आरोप हैं, जिन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।
‘Regime Change: मोहन भागवत के दशहरा भाषण पर क्यों मचा विवाद?
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने विजयादशमी के अवसर पर अपने संबोधन में देश की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा, वैश्विक हालात और भारत के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर विचार रखे। उनके संबोधन में सत्ता परिवर्तन और देश की दिशा को लेकर कही गई बातों पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
भागवत के बयान को लेकर कांग्रेस नेता प्रियांक खरगे ने सवाल उठाया कि आखिर सत्ता परिवर्तन को असंभव बताने के पीछे क्या तर्क है। उन्होंने चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब चुनाव आयोग और मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठ रहे हों, तो निष्पक्ष चुनाव कैसे सुनिश्चित होंगे?
खरगे ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को मिली कानूनी सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने सवाल किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त को न्यायिक संरक्षण की आवश्यकता क्यों है। उनका बयान ऐसे समय आया है, जब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनावी पारदर्शिता को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है।
‘RSS सांस्कृतिक संगठन है या राजनीतिक?’
प्रियांक खरगे ने RSS की भूमिका पर हमला बोलते हुए कहा कि संघ को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह सांस्कृतिक संगठन है या राजनीतिक संगठन। उन्होंने आरोप लगाया कि RSS के नेता राजनीति, अर्थव्यवस्था, रक्षा और विदेश नीति जैसे विषयों पर लगातार टिप्पणी करते हैं।
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खरगे ने संघ की पाकिस्तान के साथ संबंध बनाए रखने से जुड़ी कथित टिप्पणियों का भी जिक्र किया और पूछा कि यदि संगठन राष्ट्रीय नीतियों और राजनीतिक मामलों पर राय देता है, तो उसे केवल सांस्कृतिक संगठन के रूप में क्यों प्रस्तुत किया जाता है। उन्होंने RSS से अपनी कथित सांस्कृतिक पहचान की आड़ छोड़कर राजनीतिक संगठन के रूप में पंजीकरण कराने की चुनौती दी।
RSS के मार्च पास्ट को लेकर भी विवाद
RSS पर अपने सोशल मीडिया पोस्ट और संगठन के मार्च पास्ट को लेकर उठे सवालों पर खरगे ने कहा कि संघ पर भी वही नियम लागू होते हैं, जो अन्य संगठनों पर लागू होते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार केवल मार्च पास्ट से पहले आवश्यक अनुमति लेने की मांग कर रही है।
खरगे के मुताबिक, यदि मार्च पास्ट के रास्ते या आयोजन को लेकर कोई समस्या है, तो स्थानीय अधिकारियों को उसका समाधान निकालने के निर्देश दिए गए हैं। इस तरह कर्नाटक में RSS की गतिविधियों को लेकर प्रशासनिक नियमों का मुद्दा भी राजनीतिक विवाद का हिस्सा बन गया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने RSS की संगठनात्मक पहचान, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और राजनीतिक विमर्श में संघ की भूमिका को लेकर कांग्रेस तथा भाजपा-संघ परिवार के बीच जारी टकराव को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
मोहन भागवत ने दशहरा भाषण में क्या कहा था?
20 अक्टूबर 2026 को नागपुर में RSS के विजयादशमी समारोह में मोहन भागवत ने फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल में हुए राजनीतिक घटनाक्रमों का हवाला देते हुए कहा कि भारत में भी ‘रिजीम चेंज’ की कोशिशें हो रही हैं, लेकिन यहां सत्ता परिवर्तन के जरिए हालात बदलने की कोशिश सफल नहीं होगी। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ बाहरी ताकतें भारत को कमजोर करना चाहती हैं और कुछ महत्वाकांक्षी नेता अपने राजनीतिक हितों के कारण ऐसे प्रयासों का हिस्सा बनते हैं।
भागवत ने आंदोलनों की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि विरोध-प्रदर्शनों का उद्देश्य समस्याओं का समाधान होना चाहिए, न कि समाज में विभाजन और अशांति पैदा करना। उनके मुताबिक, आंदोलनों, प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व, सभी को संविधान, कानून और सार्वजनिक जीवन की मर्यादा का पालन करना चाहिए।
